जुहोत्यादि गण — लट् लकार
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जुहोत्यादि गण — तीसरा गण
जुहोत्यादि गण = तीसरा गण (3rd conjugation class)। इसका नाम ‘हु’ धातु (हवन करना) के रूप जुहोति से पड़ा है।
यह गण संस्कृत की सबसे प्राचीन और रोचक विशेषता — द्वित्व (reduplication) — का प्रयोग करता है।
द्वित्व (Reduplication) क्या है?
द्वित्व = धातु के प्रथम व्यञ्जन + स्वर की आवृत्ति (दोहराव):
| धातु | प्रथम अक्षर | द्वित्व | परिणाम |
|---|---|---|---|
| हु | ह + उ | जु + हु | जुहु- |
| दा | द + आ | द + दा | ददा- |
| धा | ध + आ | द + धा | दधा- |
| भी | भ + ई | बि + भी | बिभी- |
द्वित्व के नियम
- महाप्राण → अल्पप्राण: द्वित्व में महाप्राण (ध, भ, घ…) अल्पप्राण (द, ब, ग…) बनता है
- धा → द-धा (दधा-)
- भी → ब-भी (बिभी-)
- दीर्घ स्वर → ह्रस्व: द्वित्व में दीर्घ स्वर ह्रस्व हो जाता है
- दा (आ → अ) → द-दा
- भी (ई → इ) → बि-भी
- कण्ठ्य/तालव्य विशेष: ह → ज (हु → जुहु)
जुहोत्यादि गण की एक और विशेषता — बलवान / दुर्बल
अदादि गण की तरह, जुहोत्यादि में भी कोई विकरण नहीं। इसके अतिरिक्त:
- एकवचन में बलवान अंश (गुण/दीर्घ स्वर)
- द्विवचन/बहुवचन में दुर्बल अंश (मूल/ह्रस्व स्वर)
| धातु | बलवान (एकवचन) | दुर्बल (बहुवचन) |
|---|---|---|
| हु | जुहो- (उ→ओ, गुण) | जुहु- / जुह्व- |
| दा | ददा- (आ) | दद- (अ) |
| धा | दधा- (आ) | दध- (अ) |
हु धातु — लट् लकार (9 रूप)
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष (वह/वे) | जुहोति | जुहुतः | जुह्वति |
| मध्यम पुरुष (तू/तुम) | जुहोषि | जुहुथः | जुहुथ |
| उत्तम पुरुष (मैं/हम) | जुहोमि | जुहुवः | जुहुमः |
एकवचन में जुहो- (गुण: उ→ओ), द्विवचन/बहुवचन में जुहु- (मूल)।
दा धातु — लट् लकार
दा (देना) → द्वित्व: ददा-
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | ददाति | ददतः | ददति |
| मध्यम पुरुष | ददासि | ददथः | ददथ |
| उत्तम पुरुष | ददामि | ददवः | ददमः |
एकवचन में ददा- (दीर्घ), द्विवचन/बहुवचन में दद- (ह्रस्व)।
धा धातु — लट् लकार
धा (रखना/धारण करना) → द्वित्व: दधा- (ध → द)
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | दधाति | दधतः | दधति |
| मध्यम पुरुष | दधासि | दधथः | दधथ |
| उत्तम पुरुष | दधामि | दधवः | दधमः |
भी धातु — लट् लकार
भी (डरना) → द्वित्व: बिभी- (भ → ब, ई → इ)
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | बिभेति | बिभीतः | बिभ्यति |
| मध्यम पुरुष | बिभेषि | बिभीथः | बिभीथ |
| उत्तम पुरुष | बिभेमि | बिभीवः | बिभीमः |
एकवचन में गुण (ई→ए): बिभे-ति। बहुवचन प्र.पु. में विशेष: बिभ्यति।
द्वित्व प्रक्रिया — सारांश
| मूल धातु | द्वित्व | बलवान (ए.व.) | दुर्बल (ब.व.) |
|---|---|---|---|
| हु | जुहु- | जुहो- | जुहु- / जुह्व- |
| दा | ददा- | ददा- | दद- |
| धा | दधा- | दधा- | दध- |
| भी | बिभी- | बिभे- | बिभी- / बिभ्य- |
उदाहरण वाक्य
| संस्कृत | अर्थ |
|---|---|
| ब्राह्मणः अग्नौ जुहोति | ब्राह्मण अग्नि में हवन करता है |
| राजा प्रजाभ्यः धनं ददाति | राजा प्रजा को धन देता है |
| माता शिशुं क्रोडे दधाति | माता शिशु को गोद में रखती है |
| मृगाः सिंहात् बिभ्यति | मृग सिंह से डरते हैं |
| अहं गुरवे पुष्पं ददामि | मैं गुरु को पुष्प देता हूँ |
मूल पाठ में प्रयोग
ब्राह्मणः प्रातःकाले अग्निं प्रज्वालयति। सः घृतेन अग्नौ जुहोति। देवेभ्यः हविः ददाति। जनाः श्रद्धया मन्त्रान् दधति।
| शब्द | अर्थ | व्याकरण |
|---|---|---|
| जुहोति | (वह) हवन करता है | हु, लट्, प्र.पु.ए. |
| ददाति | (वह) देता है | दा, लट्, प्र.पु.ए. |
| दधति | (वे सब) धारण करते हैं | धा, लट्, प्र.पु.ब. |
अनुवाद: ब्राह्मण प्रातःकाल अग्नि प्रज्वलित करता है। वह घृत से अग्नि में हवन करता है। देवताओं को हवि देता है। लोग श्रद्धा से मन्त्रों को धारण करते हैं।
याद रखें
- जुहोत्यादि गण = तीसरा गण। विशेषता = द्वित्व (reduplication) — धातु के प्रथम अक्षर का दोहराव
- द्वित्व नियम: महाप्राण → अल्पप्राण (ध→द, भ→ब), दीर्घ → ह्रस्व (आ→अ, ई→इ)
- बलवान/दुर्बल: एकवचन में बलवान (ददा-ति), बहुवचन में दुर्बल (दद-ति)
- प्रमुख रूप: जुहोति (हवन करता है), ददाति (देता है), दधाति (रखता है), बिभेति (डरता है)
अभ्यास
जुहोत्यादि गण कौन-सा गण है?