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इस मॉड्यूल के पाठ

दिवादि गण — लट् लकार

अनुमानित समय: 20 मिनट

दिवादि गण — चौथा गण

अब तक हमने भ्वादि गण (पहला गण) के विभिन्न लकार सीखे। अब एक नया गण सीखें — दिवादि गण (चौथा गण)।

‘दिवादि’ = दिव् + आदि = ‘दिव्’ धातु से शुरू होने वाला समूह।

दिवादि गण की विशेषता — ‘-य-’ विकरण

प्रत्येक गण की अपनी विशेष पहचान होती है जिसे विकरण (class marker) कहते हैं:

गणविकरणउदाहरण
भ्वादि (1st)-अ- (शप्)गम् + अ + ति = गच्छति
दिवादि (4th)-य- (श्यन्)नश् + य + ति = नश्यति

दिवादि गण में धातु और पुरुष-प्रत्यय के बीच ‘-य-’ जुड़ता है।

प्रमुख दिवादि धातुएँ

धातुअर्थलट् प्र.पु.ए.
दिव्खेलनादीव्यति
नश्नष्ट होनानश्यति
तुष्प्रसन्न होनातुष्यति
मद्मस्त होनामद्यति
कुप्क्रोध करनाकुप्यति
शुष्सूखनाशुष्यति
पुष्पोषण करनापुष्यति

नश् धातु — लट् लकार (9 रूप)

नश् + य = नश्य-

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुष (वह/वे)नश्यतिनश्यतःनश्यन्ति
मध्यम पुरुष (तू/तुम)नश्यसिनश्यथःनश्यथ
उत्तम पुरुष (मैं/हम)नश्यामिनश्यावःनश्यामः

तुष् धातु — लट् लकार

तुष् + य = तुष्य-

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषतुष्यतितुष्यतःतुष्यन्ति
मध्यम पुरुषतुष्यसितुष्यथःतुष्यथ
उत्तम पुरुषतुष्यामितुष्यावःतुष्यामः

दिव् धातु — लट् लकार

दिव् + य = दीव्य- (दिव् → दीव् — स्वर दीर्घ होता है)

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषदीव्यतिदीव्यतःदीव्यन्ति
मध्यम पुरुषदीव्यसिदीव्यथःदीव्यथ
उत्तम पुरुषदीव्यामिदीव्यावःदीव्यामः

भ्वादि और दिवादि — तुलना

भ्वादि: पठ् (लट्)दिवादि: नश् (लट्)
प्र.पु.ए.पठतिनश्यति
प्र.पु.द्वि.पठतःनश्यतः
प्र.पु.ब.पठन्तिनश्यन्ति
म.पु.ए.पठसिनश्यसि
उ.पु.ए.पठामिनश्यामि

ध्यान दें — पुरुष-वचन प्रत्यय (-ति, -तः, -न्ति, -सि, -मि आदि) दोनों गणों में समान हैं। अन्तर केवल विकरण में है: भ्वादि में ‘-अ-’, दिवादि में ‘-य-’।

उदाहरण वाक्य

संस्कृतअर्थ
फलं नश्यतिफल नष्ट होता है
गुरुः तुष्यतिगुरु प्रसन्न होते हैं
बालकाः दीव्यन्तिबालक खेलते हैं
जनाः कुप्यन्तिलोग क्रोध करते हैं
जलं शुष्यतिपानी सूखता है

मूल पाठ में प्रयोग

बालकाः क्रीडाक्षेत्रे दीव्यन्ति। गुरुः तान् दृष्ट्वा तुष्यति। किन्तु एकः बालकः कुप्यति। तस्य क्रीडनकं नश्यति।

शब्दअर्थव्याकरण
दीव्यन्ति(वे) खेलते हैंदिव्, लट्, प्र.पु.ब.
तुष्यति(वह) प्रसन्न होता हैतुष्, लट्, प्र.पु.ए.
कुप्यति(वह) क्रोध करता हैकुप्, लट्, प्र.पु.ए.
नश्यति(वह) नष्ट होता हैनश्, लट्, प्र.पु.ए.

अनुवाद: बालक खेल के मैदान में खेलते हैं। गुरु उन्हें देखकर प्रसन्न होते हैं। किन्तु एक बालक क्रोध करता है। उसका खिलौना नष्ट होता है।

याद रखें

  1. दिवादि गण = चौथा गण। विकरण = ‘-य-’ (श्यन्)
  2. धातु + + पुरुष प्रत्यय: नश् + य + ति = नश्यति
  3. पुरुष-वचन प्रत्यय भ्वादि गण जैसे ही हैं — केवल विकरण भिन्न है
  4. प्रमुख धातुएँ: नश्यति (नष्ट होता है), तुष्यति (प्रसन्न होता है), कुप्यति (क्रोध करता है), दीव्यति (खेलता है)

अभ्यास

प्रश्न 1 / 90 सही

दिवादि गण कौन-सा गण है?