दिवादि गण — लट् लकार
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दिवादि गण — चौथा गण
अब तक हमने भ्वादि गण (पहला गण) के विभिन्न लकार सीखे। अब एक नया गण सीखें — दिवादि गण (चौथा गण)।
‘दिवादि’ = दिव् + आदि = ‘दिव्’ धातु से शुरू होने वाला समूह।
दिवादि गण की विशेषता — ‘-य-’ विकरण
प्रत्येक गण की अपनी विशेष पहचान होती है जिसे विकरण (class marker) कहते हैं:
| गण | विकरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| भ्वादि (1st) | -अ- (शप्) | गम् + अ + ति = गच्छति |
| दिवादि (4th) | -य- (श्यन्) | नश् + य + ति = नश्यति |
दिवादि गण में धातु और पुरुष-प्रत्यय के बीच ‘-य-’ जुड़ता है।
प्रमुख दिवादि धातुएँ
| धातु | अर्थ | लट् प्र.पु.ए. |
|---|---|---|
| दिव् | खेलना | दीव्यति |
| नश् | नष्ट होना | नश्यति |
| तुष् | प्रसन्न होना | तुष्यति |
| मद् | मस्त होना | मद्यति |
| कुप् | क्रोध करना | कुप्यति |
| शुष् | सूखना | शुष्यति |
| पुष् | पोषण करना | पुष्यति |
नश् धातु — लट् लकार (9 रूप)
नश् + य = नश्य-
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष (वह/वे) | नश्यति | नश्यतः | नश्यन्ति |
| मध्यम पुरुष (तू/तुम) | नश्यसि | नश्यथः | नश्यथ |
| उत्तम पुरुष (मैं/हम) | नश्यामि | नश्यावः | नश्यामः |
तुष् धातु — लट् लकार
तुष् + य = तुष्य-
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | तुष्यति | तुष्यतः | तुष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | तुष्यसि | तुष्यथः | तुष्यथ |
| उत्तम पुरुष | तुष्यामि | तुष्यावः | तुष्यामः |
दिव् धातु — लट् लकार
दिव् + य = दीव्य- (दिव् → दीव् — स्वर दीर्घ होता है)
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | दीव्यति | दीव्यतः | दीव्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | दीव्यसि | दीव्यथः | दीव्यथ |
| उत्तम पुरुष | दीव्यामि | दीव्यावः | दीव्यामः |
भ्वादि और दिवादि — तुलना
| भ्वादि: पठ् (लट्) | दिवादि: नश् (लट्) | |
|---|---|---|
| प्र.पु.ए. | पठति | नश्यति |
| प्र.पु.द्वि. | पठतः | नश्यतः |
| प्र.पु.ब. | पठन्ति | नश्यन्ति |
| म.पु.ए. | पठसि | नश्यसि |
| उ.पु.ए. | पठामि | नश्यामि |
ध्यान दें — पुरुष-वचन प्रत्यय (-ति, -तः, -न्ति, -सि, -मि आदि) दोनों गणों में समान हैं। अन्तर केवल विकरण में है: भ्वादि में ‘-अ-’, दिवादि में ‘-य-’।
उदाहरण वाक्य
| संस्कृत | अर्थ |
|---|---|
| फलं नश्यति | फल नष्ट होता है |
| गुरुः तुष्यति | गुरु प्रसन्न होते हैं |
| बालकाः दीव्यन्ति | बालक खेलते हैं |
| जनाः कुप्यन्ति | लोग क्रोध करते हैं |
| जलं शुष्यति | पानी सूखता है |
मूल पाठ में प्रयोग
बालकाः क्रीडाक्षेत्रे दीव्यन्ति। गुरुः तान् दृष्ट्वा तुष्यति। किन्तु एकः बालकः कुप्यति। तस्य क्रीडनकं नश्यति।
| शब्द | अर्थ | व्याकरण |
|---|---|---|
| दीव्यन्ति | (वे) खेलते हैं | दिव्, लट्, प्र.पु.ब. |
| तुष्यति | (वह) प्रसन्न होता है | तुष्, लट्, प्र.पु.ए. |
| कुप्यति | (वह) क्रोध करता है | कुप्, लट्, प्र.पु.ए. |
| नश्यति | (वह) नष्ट होता है | नश्, लट्, प्र.पु.ए. |
अनुवाद: बालक खेल के मैदान में खेलते हैं। गुरु उन्हें देखकर प्रसन्न होते हैं। किन्तु एक बालक क्रोध करता है। उसका खिलौना नष्ट होता है।
याद रखें
- दिवादि गण = चौथा गण। विकरण = ‘-य-’ (श्यन्)
- धातु + य + पुरुष प्रत्यय: नश् + य + ति = नश्यति
- पुरुष-वचन प्रत्यय भ्वादि गण जैसे ही हैं — केवल विकरण भिन्न है
- प्रमुख धातुएँ: नश्यति (नष्ट होता है), तुष्यति (प्रसन्न होता है), कुप्यति (क्रोध करता है), दीव्यति (खेलता है)
अभ्यास
दिवादि गण कौन-सा गण है?