अदादि गण — लट् लकार
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अदादि गण — दूसरा गण
अदादि गण = दूसरा गण (2nd conjugation class)। ‘अदादि’ = अद् + आदि = ‘अद्’ धातु (खाना) से शुरू होने वाला समूह।
यह गण विशेष है क्योंकि इसमें कोई विकरण नहीं लगता — धातु सीधे प्रत्यय ग्रहण करती है।
अदादि गण की विशेषता — शून्य विकरण
| गण | विकरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| भ्वादि (1st) | -अ- | गम् + अ + ति = गच्छति |
| दिवादि (4th) | -य- | नश् + य + ति = नश्यति |
| तुदादि (6th) | -अ- | तुद् + अ + ति = तुदति |
| चुरादि (10th) | -अय- | चुर् + अय + ति = चोरयति |
| अदादि (2nd) | शून्य | अद् + ति = अत्ति |
विकरण न होने से धातु का अन्तिम अक्षर सीधे प्रत्यय से मिलता है। इसलिए व्यञ्जन सन्धि के नियम लागू होते हैं और कई अनियमित रूप बनते हैं।
प्रमुख अदादि धातुएँ
| धातु | अर्थ | लट् प्र.पु.ए. | विशेष |
|---|---|---|---|
| अद् | खाना | अत्ति | द् + त = त्त |
| हन् | मारना | हन्ति | — |
| अस् | होना | अस्ति | अत्यन्त प्रसिद्ध |
| इ | जाना | एति | इ → ए (गुण) |
| शी | सोना | शेते | आत्मनेपद |
| द्विष् | द्वेष करना | द्वेष्टि | — |
अस् धातु — लट् लकार (9 रूप)
‘अस्’ = होना (to be)। संस्कृत की सबसे महत्त्वपूर्ण धातुओं में से एक।
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष (वह/वे) | अस्ति | स्तः | सन्ति |
| मध्यम पुरुष (तू/तुम) | असि | स्थः | स्थ |
| उत्तम पुरुष (मैं/हम) | अस्मि | स्वः | स्मः |
ध्यान दें — द्विवचन और बहुवचन में ‘अ’ लुप्त हो जाता है: अस् → स्तः, सन्ति, स्मः आदि।
हन् धातु — लट् लकार
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | हन्ति | हतः | घ्नन्ति |
| मध्यम पुरुष | हंसि | हथः | हथ |
| उत्तम पुरुष | हन्मि | हन्वः | हन्मः |
हन् धातु अत्यन्त अनियमित है: बहुवचन में हन् → घ्न (हन् का ‘ह’ → ‘घ’ और ‘न’ → ‘न’ बचता है)।
अद् धातु — लट् लकार
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | अत्ति | अत्तः | अदन्ति |
| मध्यम पुरुष | अत्सि | अत्थः | अत्थ |
| उत्तम पुरुष | अद्मि | अद्वः | अद्मः |
अद् + ति = अत्ति (द् + त = त्त — व्यञ्जन सन्धि)।
इ धातु — लट् लकार
इ → ए (गुण)
| एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | एति | इतः | यन्ति |
| मध्यम पुरुष | एषि | इथः | इथ |
| उत्तम पुरुष | एमि | इवः | इमः |
एकवचन में गुण (इ → ए), द्विवचन-बहुवचन में मूल ‘इ’ रहता है। बहुवचन प्र.पु. में इ → यन्ति (विशेष रूप)।
अदादि गण में अनियमितताएँ
अदादि गण सबसे कठिन गणों में से है क्योंकि:
- विकरण शून्य — धातु अन्त सीधे प्रत्यय से मिलता है
- व्यञ्जन सन्धि — अद् + ति = अत्ति, अद् + सि = अत्सि
- अनियमित रूप — हन् → घ्नन्ति, अस् → सन्ति
- बलवान/दुर्बल अंश — एकवचन में प्रायः बलवान रूप (गुण), बहुवचन में दुर्बल
उदाहरण वाक्य
| संस्कृत | अर्थ |
|---|---|
| तत्र एकः सिंहः अस्ति | वहाँ एक सिंह है |
| बालकाः फलानि अदन्ति | बालक फल खाते हैं |
| सिंहः मृगं हन्ति | सिंह मृग को मारता है |
| नद्यः समुद्रम् यन्ति | नदियाँ समुद्र को जाती हैं |
| अहम् अस्मि | मैं हूँ |
मूल पाठ में प्रयोग
एकस्मिन् वने एकः सिंहः अस्ति। सः प्रतिदिनं मृगान् हन्ति। मृगाः भयेन वनात् यन्ति। सिंहः एकाकी अस्ति।
| शब्द | अर्थ | व्याकरण |
|---|---|---|
| अस्ति | (वह) है | अस्, लट्, प्र.पु.ए. |
| हन्ति | (वह) मारता है | हन्, लट्, प्र.पु.ए. |
| यन्ति | (वे सब) जाते हैं | इ, लट्, प्र.पु.ब. |
अनुवाद: एक वन में एक सिंह है। वह प्रतिदिन मृगों को मारता है। मृग भय से वन से चले जाते हैं। सिंह अकेला है।
याद रखें
- अदादि गण = दूसरा गण। कोई विकरण नहीं — धातु सीधे प्रत्यय लेती है
- अस्ति (वह है), सन्ति (वे हैं), अस्मि (मैं हूँ) — सबसे महत्त्वपूर्ण रूप
- व्यञ्जन सन्धि के कारण अनियमित रूप: अद् + ति = अत्ति, हन् → घ्नन्ति
- यह गण कठिन है — इसकी धातुओं के रूप कण्ठस्थ (memorize) करने चाहिए
अभ्यास
अदादि गण कौन-सा गण है?