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इस मॉड्यूल के पाठ

अदादि गण — लट् लकार

अनुमानित समय: 20 मिनट

अदादि गण — दूसरा गण

अदादि गण = दूसरा गण (2nd conjugation class)। ‘अदादि’ = अद् + आदि = ‘अद्’ धातु (खाना) से शुरू होने वाला समूह।

यह गण विशेष है क्योंकि इसमें कोई विकरण नहीं लगता — धातु सीधे प्रत्यय ग्रहण करती है।

अदादि गण की विशेषता — शून्य विकरण

गणविकरणउदाहरण
भ्वादि (1st)-अ-गम् + + ति = गच्छति
दिवादि (4th)-य-नश् + + ति = नश्यति
तुदादि (6th)-अ-तुद् + + ति = तुदति
चुरादि (10th)-अय-चुर् + अय + ति = चोरयति
अदादि (2nd)शून्यअद् + ति = अत्ति

विकरण न होने से धातु का अन्तिम अक्षर सीधे प्रत्यय से मिलता है। इसलिए व्यञ्जन सन्धि के नियम लागू होते हैं और कई अनियमित रूप बनते हैं।

प्रमुख अदादि धातुएँ

धातुअर्थलट् प्र.पु.ए.विशेष
अद्खानाअत्तिद् + त = त्त
हन्मारनाहन्ति
अस्होनाअस्तिअत्यन्त प्रसिद्ध
जानाएतिइ → ए (गुण)
शीसोनाशेतेआत्मनेपद
द्विष्द्वेष करनाद्वेष्टि

अस् धातु — लट् लकार (9 रूप)

‘अस्’ = होना (to be)। संस्कृत की सबसे महत्त्वपूर्ण धातुओं में से एक।

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुष (वह/वे)अस्तिस्तःसन्ति
मध्यम पुरुष (तू/तुम)असिस्थःस्थ
उत्तम पुरुष (मैं/हम)अस्मिस्वःस्मः

ध्यान दें — द्विवचन और बहुवचन में ‘अ’ लुप्त हो जाता है: अस् → स्तः, सन्ति, स्मः आदि।

हन् धातु — लट् लकार

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषहन्तिहतःघ्नन्ति
मध्यम पुरुषहंसिहथःहथ
उत्तम पुरुषहन्मिहन्वःहन्मः

हन् धातु अत्यन्त अनियमित है: बहुवचन में हन् → घ्न (हन् का ‘ह’ → ‘घ’ और ‘न’ → ‘न’ बचता है)।

अद् धातु — लट् लकार

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअत्तिअत्तःअदन्ति
मध्यम पुरुषअत्सिअत्थःअत्थ
उत्तम पुरुषअद्मिअद्वःअद्मः

अद् + ति = अत्ति (द् + त = त्त — व्यञ्जन सन्धि)।

इ धातु — लट् लकार

इ → ए (गुण)

एकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषएतिइतःयन्ति
मध्यम पुरुषएषिइथःइथ
उत्तम पुरुषएमिइवःइमः

एकवचन में गुण (इ → ए), द्विवचन-बहुवचन में मूल ‘इ’ रहता है। बहुवचन प्र.पु. में इ → यन्ति (विशेष रूप)।

अदादि गण में अनियमितताएँ

अदादि गण सबसे कठिन गणों में से है क्योंकि:

  1. विकरण शून्य — धातु अन्त सीधे प्रत्यय से मिलता है
  2. व्यञ्जन सन्धि — अद् + ति = अत्ति, अद् + सि = अत्सि
  3. अनियमित रूप — हन् → घ्नन्ति, अस् → सन्ति
  4. बलवान/दुर्बल अंश — एकवचन में प्रायः बलवान रूप (गुण), बहुवचन में दुर्बल

उदाहरण वाक्य

संस्कृतअर्थ
तत्र एकः सिंहः अस्तिवहाँ एक सिंह है
बालकाः फलानि अदन्तिबालक फल खाते हैं
सिंहः मृगं हन्तिसिंह मृग को मारता है
नद्यः समुद्रम् यन्तिनदियाँ समुद्र को जाती हैं
अहम् अस्मिमैं हूँ

मूल पाठ में प्रयोग

एकस्मिन् वने एकः सिंहः अस्ति। सः प्रतिदिनं मृगान् हन्ति। मृगाः भयेन वनात् यन्ति। सिंहः एकाकी अस्ति।

शब्दअर्थव्याकरण
अस्ति(वह) हैअस्, लट्, प्र.पु.ए.
हन्ति(वह) मारता हैहन्, लट्, प्र.पु.ए.
यन्ति(वे सब) जाते हैंइ, लट्, प्र.पु.ब.

अनुवाद: एक वन में एक सिंह है। वह प्रतिदिन मृगों को मारता है। मृग भय से वन से चले जाते हैं। सिंह अकेला है।

याद रखें

  1. अदादि गण = दूसरा गण। कोई विकरण नहीं — धातु सीधे प्रत्यय लेती है
  2. अस्ति (वह है), सन्ति (वे हैं), अस्मि (मैं हूँ) — सबसे महत्त्वपूर्ण रूप
  3. व्यञ्जन सन्धि के कारण अनियमित रूप: अद् + ति = अत्ति, हन् → घ्नन्ति
  4. यह गण कठिन है — इसकी धातुओं के रूप कण्ठस्थ (memorize) करने चाहिए

अभ्यास

प्रश्न 1 / 90 सही

अदादि गण कौन-सा गण है?