बहुव्रीहि समास
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बहुव्रीहि समास क्या है?
बहुव्रीहि समास में न पूर्वपद प्रधान होता है, न उत्तरपद — अर्थ किसी बाहरी व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करता है। इसीलिए इसे ‘exocentric’ (बहिर्केन्द्रिक) कहते हैं।
पीतम् अम्बरं यस्य सः → पीताम्बरः (जिसका वस्त्र पीला है — वह = विष्णु)
यहाँ अर्थ न ‘पीत’ है, न ‘अम्बर’ — अर्थ विष्णु है जो बाहर का तत्त्व है।
मुख्य नियम
- अर्थ बाहरी — समस्त पद किसी बाहरी व्यक्ति/वस्तु को सूचित करता है
- विग्रह में ‘यस्य सः / यस्याः सा / यस्य तत्’ (जिसका/जिसकी) आता है
- समस्त पद का लिंग-वचन उस बाहरी व्यक्ति/वस्तु के अनुसार होता है
’बहुव्रीहि’ नाम की व्युत्पत्ति
‘बहुव्रीहि’ शब्द स्वयं बहुव्रीहि समास का उदाहरण है:
बहुव्रीहिः = बहवः व्रीहयः (चावल) यस्य सः = जिसके पास बहुत चावल हैं — धनी व्यक्ति
विस्तृत उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह | अर्थ (बाहरी सन्दर्भ) |
|---|---|---|
| पीताम्बरः | पीतम् अम्बरं यस्य सः | विष्णु |
| नीलकण्ठः | नीलः कण्ठः यस्य सः | शिव |
| चतुर्भुजः | चतस्रः भुजाः यस्य सः | विष्णु |
| दशरथः | दश रथाः यस्य सः | राजा दशरथ |
| दशाननः | दश आननानि यस्य सः | रावण |
| चक्रपाणिः | चक्रं पाणौ यस्य सः | विष्णु |
| शूलपाणिः | शूलं पाणौ यस्य सः | शिव |
| लम्बोदरः | लम्बम् उदरं यस्य सः | गणेश |
| चन्द्रशेखरः | चन्द्रः शेखरे यस्य सः | शिव |
| गजाननः | गजस्य आननं यस्य सः | गणेश |
तत्पुरुष/कर्मधारय से अन्तर
एक ही शब्द कर्मधारय या तत्पुरुष भी हो सकता है और बहुव्रीहि भी — अन्तर अर्थ में है:
| शब्द | कर्मधारय/तत्पुरुष अर्थ | बहुव्रीहि अर्थ |
|---|---|---|
| नीलकण्ठः | नीला कण्ठ (गला ही) | शिव (जिसका कण्ठ नीला) |
| महाबाहुः | बड़ी भुजा | अर्जुन (जिसकी भुजा बड़ी) |
| लम्बकर्णः | लम्बा कान | खरगोश/गणेश (जिसके कान लम्बे) |
पहचान कैसे करें? यदि शब्द का अर्थ स्वयं उन दो पदों तक सीमित है → कर्मधारय/तत्पुरुष। यदि अर्थ किसी बाहरी व्यक्ति/वस्तु तक जाता है → बहुव्रीहि।
बहुव्रीहि में लिंग-वचन
बहुव्रीहि का लिंग और वचन उत्तरपद का नहीं, बल्कि उस बाहरी व्यक्ति/वस्तु का होता है जिसे सूचित किया जा रहा है:
| समस्त पद | उत्तरपद | बाहरी सन्दर्भ | समास का लिंग |
|---|---|---|---|
| पीताम्बरः | अम्बरम् (नपुंसक) | विष्णु (पुल्लिंग) | पुल्लिंग |
| दशाननः | आननम् (नपुंसक) | रावण (पुल्लिंग) | पुल्लिंग |
वाक्यों में प्रयोग
पीताम्बरः जगत् रक्षति। पीताम्बर (विष्णु) जगत की रक्षा करते हैं।
नीलकण्ठः कैलासे वसति। नीलकण्ठ (शिव) कैलास पर निवास करते हैं।
चतुर्भुजः शङ्खचक्रधरः अस्ति। चतुर्भुज (विष्णु) शंख और चक्र धारण करते हैं।
दशाननं रामः अवधीत्। राम ने दशानन (रावण) का वध किया।
याद रखें
- बहुव्रीहि = अर्थ बाहरी — न पूर्वपद प्रधान, न उत्तरपद
- विग्रह में ‘यस्य सः / यस्याः सा’ (जिसका/जिसकी — वह) आता है
- लिंग-वचन बाहरी व्यक्ति/वस्तु के अनुसार (उत्तरपद के नहीं)
- संस्कृत साहित्य में देवताओं के विशेषण प्रायः बहुव्रीहि हैं
- कर्मधारय/तत्पुरुष से अन्तर = अर्थ कहाँ जाता है — शब्द तक या बाहर
अभ्यास
बहुव्रीहि समास की मुख्य विशेषता क्या है?