यद्-तद् — सम्बन्धवाचक उपवाक्य
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यद्-तद् — सम्बन्धवाचक उपवाक्य
संस्कृत में complex sentences बनाने का सबसे सामान्य तरीका यद्-तद् (relative-correlative) प्रणाली है। यह हिन्दी के “जो…वह”, “जहाँ…वहाँ” जैसा है।
मूल सिद्धान्त
संस्कृत वाक्य में दो भाग होते हैं:
- सम्बन्ध-उपवाक्य (Relative clause) — य- शब्द से शुरू
- मुख्य उपवाक्य (Main clause) — त- शब्द से शुरू
यः पठति, सः जानाति। (जो पढ़ता है, वह जानता है।)
चार प्रमुख युग्म
1. यः…सः — व्यक्ति/वस्तु (who/which…that)
| सम्बन्ध | निर्देश | अर्थ |
|---|---|---|
| यः | सः | जो…वह (पुल्लिङ्ग) |
| या | सा | जो…वह (स्त्रीलिङ्ग) |
| यत् | तत् | जो…वह (नपुंसकलिङ्ग) |
उदाहरण:
यः धर्मं चरति, सः सुखी भवति। (जो धर्म आचरण करता है, वह सुखी होता है।)
या विद्या लभते, सा सर्वत्र पूज्यते। (जो विद्या प्राप्त करती है, वह सर्वत्र पूजी जाती है।)
2. यत्र…तत्र — स्थान (where…there)
यत्र विद्या, तत्र सम्पत्तिः। (जहाँ विद्या है, वहाँ सम्पत्ति है।)
यत्र धर्मः, तत्र जयः। (जहाँ धर्म है, वहाँ जय है।)
3. यदा…तदा — काल (when…then)
यदा सूर्यः उदेति, तदा पक्षिणः गायन्ति। (जब सूर्य उदय होता है, तब पक्षी गाते हैं।)
यदा वर्षा भवति, तदा नद्यः पूर्णाः भवन्ति। (जब वर्षा होती है, तब नदियाँ भर जाती हैं।)
4. यथा…तथा — तरीका/समानता (as…so)
यथा राजा, तथा प्रजा। (जैसा राजा, वैसी प्रजा।)
यथा बीजं, तथा फलम्। (जैसा बीज, वैसा फल।)
अन्य युग्म
| सम्बन्ध | निर्देश | अर्थ |
|---|---|---|
| यावत् | तावत् | जब तक…तब तक |
| यतः | ततः | जिस ओर से…उस ओर से |
| येन | तेन | जिससे…उससे |
यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्। (जब तक जीवे, सुख से जीवे।)
लिङ्ग-वचन-विभक्ति सामञ्जस्य (Agreement)
‘यद्’ सर्वनाम जिस संज्ञा का विशेषण है, उसके लिङ्ग, वचन, विभक्ति के अनुसार बदलता है:
| लिङ्ग | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| पुल्लिङ्ग (प्रथमा) | यः…सः | यौ…तौ | ये…ते |
| स्त्रीलिङ्ग (प्रथमा) | या…सा | ये…ते | याः…ताः |
| नपुंसक (प्रथमा) | यत्…तत् | ये…ते | यानि…तानि |
विभक्ति भी बदलती है
यं जनं त्वं पश्यसि, तं अहम् अपि जानामि। (जिस व्यक्ति को तू देखता है, उसे मैं भी जानता हूँ।)
यहाँ ‘यम्’ और ‘तम्’ दोनों द्वितीया में हैं — क्योंकि ‘जन’ कर्म है।
वाक्य-क्रम
संस्कृत में relative clause पहले या बाद में आ सकता है:
| क्रम | उदाहरण |
|---|---|
| य-उपवाक्य पहले | यः पठति, सः जानाति |
| त-उपवाक्य पहले | सः जानाति, यः पठति |
दोनों सही हैं। लेकिन य-उपवाक्य पहले अधिक सामान्य है।
साहित्यिक उदाहरण
यः सर्वत्रानभिस्नेहः तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (गीता 2.57)
जो सर्वत्र अनासक्त है, शुभ-अशुभ पाकर न प्रसन्न होता है न द्वेष करता है — उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
याद रखें
- यद्-तद् = Relative-Correlative — संस्कृत का मुख्य complex sentence उपकरण
- यः-सः (व्यक्ति), यत्र-तत्र (स्थान), यदा-तदा (काल), यथा-तथा (तरीका)
- ‘यद्’ सर्वनाम लिङ्ग-वचन-विभक्ति के अनुसार बदलता है
- य-उपवाक्य प्रायः पहले आता है
- गीता, सुभाषित, हितोपदेश — सर्वत्र यद्-तद् मिलता है
अभ्यास
'यः पठति सः जानाति' का अर्थ क्या है?