तव्य, अनीय, य — विध्यर्थ कृदन्त
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तव्य, अनीय, य — विध्यर्थ कृदन्त (Gerundives)
ये तीनों प्रत्यय विधि (obligation/necessity) का अर्थ देते हैं — “करना चाहिए”, “करने योग्य”, “must/should be done”।
तीनों प्रत्ययों की तुलना
| प्रत्यय | रूप | उदाहरण (कृ धातु) | अर्थ |
|---|---|---|---|
| तव्य | नियमित | कर्तव्यः | करना चाहिए |
| अनीय | नियमित | करणीयः | करने योग्य |
| य | अनियमित (धातु बदलती है) | कार्यः | करने योग्य |
तीनों का अर्थ लगभग समान है। ‘य’ प्रत्यय में धातु का रूप अधिक बदलता है।
1. तव्य प्रत्यय
सबसे नियमित (regular) — धातु + तव्य:
| धातु | तव्य रूप | अर्थ |
|---|---|---|
| कृ | कर्तव्यः | करना चाहिए |
| गम् | गन्तव्यम् | जाना चाहिए |
| पठ् | पठितव्यः | पढ़ना चाहिए |
| वच् | वक्तव्यम् | बोलना चाहिए |
| दा | दातव्यम् | देना चाहिए |
| श्रु | श्रोतव्यम् | सुनना चाहिए |
2. अनीय प्रत्यय
धातु + अनीय:
| धातु | अनीय रूप | अर्थ |
|---|---|---|
| कृ | करणीयः | करने योग्य |
| दृश् | दर्शनीयः | देखने योग्य |
| श्रु | श्रवणीयम् | सुनने योग्य |
| मन् | मननीयम् | मनन करने योग्य |
| पूज् | पूजनीयः | पूजा के योग्य |
| स्मृ | स्मरणीयः | स्मरण के योग्य |
3. य (ण्यत्/यत्) प्रत्यय
धातु + य — धातु में आन्तरिक परिवर्तन (वृद्धि आदि) होता है:
| धातु | य रूप | अर्थ |
|---|---|---|
| कृ | कार्यः | करने योग्य |
| पा | पेयम् | पीने योग्य |
| दा | देयम् | देने योग्य |
| ज्ञा | ज्ञेयम् | जानने योग्य |
| भू | भाव्यम् | होने योग्य |
| गम् | गम्यम् | जाने योग्य / समझने योग्य |
| वच् | वाच्यम् | बोलने योग्य |
| पठ् | पाठ्यम् | पढ़ने योग्य |
ये विशेषण हैं
तीनों कृदन्त विशेषण की तरह decline होते हैं:
| लिंग | तव्य | अनीय | य |
|---|---|---|---|
| पुल्लिंग | कर्तव्यः | करणीयः | कार्यः |
| स्त्रीलिंग | कर्तव्या | करणीया | कार्या |
| नपुंसकलिंग | कर्तव्यम् | करणीयम् | कार्यम् |
वाक्यों में प्रयोग
धर्मः कर्तव्यः। धर्म करना चाहिए।
सत्यं वक्तव्यम्। सत्य बोलना चाहिए।
गीता श्रवणीया / श्रोतव्या। गीता सुनने योग्य है।
सः दर्शनीयः पुरुषः अस्ति। वह देखने योग्य (दर्शनीय) पुरुष है।
जलं पेयम्, विषं न पेयम्। जल पीने योग्य है, विष नहीं।
कार्यं कर्तव्यम् एव। कार्य (कर्तव्य) करना ही चाहिए।
गीता से प्रसिद्ध उदाहरण
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (2.47) कर्म में ही तेरा अधिकार है (कर्तव्य)।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। (6.35) अभ्यास और वैराग्य से (मन) वश में किया जाने योग्य है।
याद रखें
- तव्य, अनीय, य — तीनों का अर्थ “करना चाहिए / करने योग्य”
- तीनों विशेषण हैं — लिंग-वचन-विभक्ति बदलती है
- तव्य सबसे नियमित, य में धातु अधिक बदलती है
- ये हिन्दी के “-नीय”, “-योग्य”, “-ने चाहिए” के समकक्ष हैं
- कर्तव्य, कार्य, करणीय — ये तीनों ‘कृ’ धातु से बने प्रसिद्ध शब्द हैं
अभ्यास
तव्य, अनीय, य — इन तीनों प्रत्ययों का सामान्य अर्थ क्या है?