आशीर्लिङ् — आशीर्वाद
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आशीर्लिङ् लकार क्या है?
आशीर्लिङ् (Benedictive mood) संस्कृत का एक विशेष लकार है जो आशीर्वाद, शुभकामना और मङ्गल-कामना के लिए प्रयुक्त होता है।
आशीः (आशीर्वाद) + लिङ् (लकार) = आशीर्लिङ्
विधिलिङ् और आशीर्लिङ् में अन्तर
| विधिलिङ् | आशीर्लिङ् | |
|---|---|---|
| अर्थ | चाहिए, सम्भावना | आशीर्वाद, शुभकामना |
| उदाहरण | भवेत् (हो सकता है/होना चाहिए) | भूयात् (हो! — आशीर्वाद) |
| प्रयोग | सामान्य/कथन | मन्त्र, आशीर्वाद, शुभकामना |
परस्मैपद — आशीर्लिङ्
प्रमुख चिह्न: -यात् (प्र.पु.ए.)
भू धातु — आशीर्लिङ् (परस्मैपद)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम | भूयात् | भूयास्ताम् | भूयासुः |
| मध्यम | भूयाः | भूयास्तम् | भूयास्त |
| उत्तम | भूयासम् | भूयास्व | भूयास्म |
अन्य धातुओं के रूप (प्रथम पुरुष एकवचन)
| धातु | आशीर्लिङ् (प्र.पु.ए.) | अर्थ |
|---|---|---|
| भू (होना) | भूयात् | हो! |
| जीव् (जीना) | जीव्यात् | जीवे! |
| वृध् (बढ़ना) | वृध्यात् | बढ़े! |
| सुख् (सुखी होना) | सुख्यात् | सुखी हो! |
आत्मनेपद — आशीर्लिङ्
प्रमुख चिह्न: -ईष्ट (प्र.पु.ए.)
कृ धातु — आशीर्लिङ् (आत्मनेपद)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम | कृषीष्ट | कृषीयास्ताम् | कृषीरन् |
| मध्यम | कृषीष्ठाः | कृषीयास्थाम् | कृषीध्वम् |
| उत्तम | कृषीय | कृषीवहि | कृषीमहि |
प्रसिद्ध आशीर्वाद — साहित्य से
संस्कृत साहित्य और मन्त्रों में आशीर्लिङ् के उदाहरण:
| आशीर्वाद | अर्थ |
|---|---|
| चिरं जीव्यात् | दीर्घायु हो! |
| शुभं भूयात् | शुभ हो! |
| कल्याणं भूयात् | कल्याण हो! |
| विजयी भूयात् | विजयी हो! |
| सर्वे भूयासुः सुखिनः | सब सुखी हों! |
ये आशीर्वाद-वाक्य आज भी दैनिक संस्कृत प्रयोग में मिलते हैं।
आशीर्लिङ् कब प्रयुक्त होता है?
- आशीर्वाद देते समय — चिरं जीव्यात् (दीर्घायु हो!)
- मन्त्रों/प्रार्थनाओं में — सर्वे भूयासुः सुखिनः (सब सुखी हों)
- शुभकामना में — शुभं भूयात् (शुभ हो!)
व्यावहारिक संस्कृत में आशीर्लिङ् दुर्लभ है। अधिकतर लोट् लकार (भवतु) या विधिलिङ् (भवेत्) से काम चलता है। लेकिन मन्त्रों और शास्त्रीय शैली में आशीर्लिङ् मिलता है।
याद रखें
- आशीर्लिङ् = Benedictive = आशीर्वाद/शुभकामना
- परस्मैपद चिह्न: -यात् (प्र.पु.ए.)
- आत्मनेपद चिह्न: -ईष्ट (प्र.पु.ए.)
- प्रसिद्ध उदाहरण: भूयात् (हो!), जीव्यात् (जीवे!)
- मन्त्रों, आशीर्वादों और शास्त्रीय शैली में प्रयुक्त — दैनिक गद्य में दुर्लभ
अभ्यास
प्रश्न 1 / 60 सही
आशीर्लिङ् लकार का प्रयोग किसके लिए होता है?