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परस्मैपद और आत्मनेपद

अनुमानित समय: 18 मिनट

परस्मैपद और आत्मनेपद

संस्कृत में प्रत्येक धातु के दो प्रकार के प्रत्यय-समूह होते हैं:

  1. परस्मैपद (Active) — “दूसरे के लिए शब्द”
  2. आत्मनेपद (Middle) — “अपने लिए शब्द”

शाब्दिक अर्थ

पदव्युत्पत्तिअर्थ
परस्मैपदपरस्मै (दूसरे के लिए) + पदक्रिया का फल दूसरे को
आत्मनेपदआत्मने (अपने लिए) + पदक्रिया का फल स्वयं को

तीन प्रकार की धातुएँ

प्रकारअर्थउदाहरण
परस्मैपदीकेवल परस्मैपद प्रत्ययभू (होना), गम् (जाना), पठ् (पढ़ना)
आत्मनेपदीकेवल आत्मनेपद प्रत्ययलभ् (पाना), सेव् (सेवा करना), मोद् (प्रसन्न होना)
उभयपदीदोनों प्रत्ययकृ (करना), पच् (पकाना), नी (ले जाना)

प्रत्यय तुलना — लट् लकार

पुरुषपरस्मैपदआत्मनेपद
प्र.पु.ए.-ति-ते
प्र.पु.द्वि.-तः-एते
प्र.पु.ब.-न्ति-न्ते
म.पु.ए.-सि-से
म.पु.द्वि.-थः-एथे
म.पु.ब.-थ-ध्वे
उ.पु.ए.-मि-ए
उ.पु.द्वि.-वः-वहे
उ.पु.ब.-मः-महे

उदाहरण — कृ धातु (उभयपदी)

परस्मैपद (लट्) — जब फल दूसरे के लिए

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमकरोतिकुरुतःकुर्वन्ति
मध्यमकरोषिकुरुथःकुरुथ
उत्तमकरोमिकुर्वःकुर्मः

आत्मनेपद (लट्) — जब फल स्वयं के लिए

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमकुरुतेकुर्वातेकुर्वते
मध्यमकुरुषेकुर्वाथेकुरुध्वे
उत्तमकुर्वेकुर्वहेकुर्महे

अर्थ-भेद

वाक्यपदअर्थ
सः यज्ञं करोतिपरस्मैपदवह (दूसरे के लिए) यज्ञ करता है
सः यज्ञं कुरुतेआत्मनेपदवह (अपने लिए) यज्ञ करता है

प्रमुख आत्मनेपदी धातुएँ

धातुअर्थलट् (प्र.पु.ए.)कारण
लभ्पानालभतेफल स्वयं को मिलता है
सेव्सेवा करनासेवतेसेवा का फल स्वयं को
मोद्प्रसन्न होनामोदतेप्रसन्नता स्वयं की
वृध्बढ़नावर्धतेबढ़ना स्वयं का
भाष्बोलनाभाषतेबोलने का फल स्वयं को
मन्सोचनामन्यतेविचार स्वयं का

प्रमुख परस्मैपदी धातुएँ

धातुअर्थलट् (प्र.पु.ए.)
भूहोनाभवति
गम्जानागच्छति
पठ्पढ़नापठति
हस्हँसनाहसति
स्थाखड़ा होनातिष्ठति

नियम — कौन-सी धातु कौन-सा पद?

सामान्य सिद्धान्त

  1. जब क्रिया का फल दूसरे को मिले → परस्मैपद
  2. जब क्रिया का फल स्वयं को मिले → आत्मनेपद
  3. लेकिन व्यवहार में यह नियम पूर्णतः कठोर नहीं है

विशेष नियम

  • कर्मवाच्य में सदैव आत्मनेपद
  • भाववाच्य में सदैव आत्मनेपद
  • सन्, यङ्, णिच् प्रत्ययान्त धातुएँ → प्रायः उभयपदी

याद रखें

  1. परस्मैपद = -ति/-तः/-न्ति — फल दूसरे के लिए
  2. आत्मनेपद = -ते/-एते/-न्ते — फल स्वयं के लिए
  3. उभयपदी = दोनों प्रत्यय ले सकती है (कृ, पच्, नी)
  4. कर्मवाच्य/भाववाच्य = सदैव आत्मनेपद
  5. धातु का पद-प्रकार धातुपाठ (verb list) से जानना होता है — रटने की आवश्यकता नहीं, अभ्यास से आता है

अभ्यास

प्रश्न 1 / 60 सही

'परस्मैपद' का शाब्दिक अर्थ क्या है?