परस्मैपद और आत्मनेपद
संस्कृत में प्रत्येक धातु के दो प्रकार के प्रत्यय-समूह होते हैं:
- परस्मैपद (Active) — “दूसरे के लिए शब्द”
- आत्मनेपद (Middle) — “अपने लिए शब्द”
शाब्दिक अर्थ
| पद | व्युत्पत्ति | अर्थ |
|---|
| परस्मैपद | परस्मै (दूसरे के लिए) + पद | क्रिया का फल दूसरे को |
| आत्मनेपद | आत्मने (अपने लिए) + पद | क्रिया का फल स्वयं को |
तीन प्रकार की धातुएँ
| प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|
| परस्मैपदी | केवल परस्मैपद प्रत्यय | भू (होना), गम् (जाना), पठ् (पढ़ना) |
| आत्मनेपदी | केवल आत्मनेपद प्रत्यय | लभ् (पाना), सेव् (सेवा करना), मोद् (प्रसन्न होना) |
| उभयपदी | दोनों प्रत्यय | कृ (करना), पच् (पकाना), नी (ले जाना) |
प्रत्यय तुलना — लट् लकार
| पुरुष | परस्मैपद | आत्मनेपद |
|---|
| प्र.पु.ए. | -ति | -ते |
| प्र.पु.द्वि. | -तः | -एते |
| प्र.पु.ब. | -न्ति | -न्ते |
| म.पु.ए. | -सि | -से |
| म.पु.द्वि. | -थः | -एथे |
| म.पु.ब. | -थ | -ध्वे |
| उ.पु.ए. | -मि | -ए |
| उ.पु.द्वि. | -वः | -वहे |
| उ.पु.ब. | -मः | -महे |
उदाहरण — कृ धातु (उभयपदी)
परस्मैपद (लट्) — जब फल दूसरे के लिए
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|
| प्रथम | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
| मध्यम | करोषि | कुरुथः | कुरुथ |
| उत्तम | करोमि | कुर्वः | कुर्मः |
आत्मनेपद (लट्) — जब फल स्वयं के लिए
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|
| प्रथम | कुरुते | कुर्वाते | कुर्वते |
| मध्यम | कुरुषे | कुर्वाथे | कुरुध्वे |
| उत्तम | कुर्वे | कुर्वहे | कुर्महे |
अर्थ-भेद
| वाक्य | पद | अर्थ |
|---|
| सः यज्ञं करोति | परस्मैपद | वह (दूसरे के लिए) यज्ञ करता है |
| सः यज्ञं कुरुते | आत्मनेपद | वह (अपने लिए) यज्ञ करता है |
प्रमुख आत्मनेपदी धातुएँ
| धातु | अर्थ | लट् (प्र.पु.ए.) | कारण |
|---|
| लभ् | पाना | लभते | फल स्वयं को मिलता है |
| सेव् | सेवा करना | सेवते | सेवा का फल स्वयं को |
| मोद् | प्रसन्न होना | मोदते | प्रसन्नता स्वयं की |
| वृध् | बढ़ना | वर्धते | बढ़ना स्वयं का |
| भाष् | बोलना | भाषते | बोलने का फल स्वयं को |
| मन् | सोचना | मन्यते | विचार स्वयं का |
प्रमुख परस्मैपदी धातुएँ
| धातु | अर्थ | लट् (प्र.पु.ए.) |
|---|
| भू | होना | भवति |
| गम् | जाना | गच्छति |
| पठ् | पढ़ना | पठति |
| हस् | हँसना | हसति |
| स्था | खड़ा होना | तिष्ठति |
नियम — कौन-सी धातु कौन-सा पद?
सामान्य सिद्धान्त
- जब क्रिया का फल दूसरे को मिले → परस्मैपद
- जब क्रिया का फल स्वयं को मिले → आत्मनेपद
- लेकिन व्यवहार में यह नियम पूर्णतः कठोर नहीं है
विशेष नियम
- कर्मवाच्य में सदैव आत्मनेपद
- भाववाच्य में सदैव आत्मनेपद
- सन्, यङ्, णिच् प्रत्ययान्त धातुएँ → प्रायः उभयपदी
याद रखें
- परस्मैपद = -ति/-तः/-न्ति — फल दूसरे के लिए
- आत्मनेपद = -ते/-एते/-न्ते — फल स्वयं के लिए
- उभयपदी = दोनों प्रत्यय ले सकती है (कृ, पच्, नी)
- कर्मवाच्य/भाववाच्य = सदैव आत्मनेपद
- धातु का पद-प्रकार धातुपाठ (verb list) से जानना होता है — रटने की आवश्यकता नहीं, अभ्यास से आता है