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श्लोक विश्लेषण — समासिक पद्य वाचन

अनुमानित समय: 25 मिनट

श्लोक विश्लेषण — समासिक पद्य वाचन

यह capstone पाठ है — इसमें हम वास्तविक संस्कृत श्लोकों का सम्पूर्ण व्याकरणिक विश्लेषण करेंगे। इसमें इस स्तर तक पढ़े सभी व्याकरण-बिन्दुओं का प्रयोग दिखेगा: सन्धि, समास, कृदन्त, विभक्ति, वाच्य, लकार।


श्लोक 1: विद्या ददाति विनयम् (सुभाषित)

विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनम् आप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥

पद-विच्छेद

सन्धि शब्दविच्छेदसन्धि नियम
विनयाद्विनयात्त् → द् (पद-अन्त नियम)
पात्रत्वाद्पात्रत्वात्त् → द्
धनम् आप्नोतिधनम् + आप्नोति(कोई सन्धि नहीं)
धनाद् धर्मम्धनात् + धर्मम्त् → द् (ध् के पूर्व)

पद-विश्लेषण

पदमूल शब्दविभक्तिअर्थ
विद्याविद्या (स्त्री.)प्रथमा ए.विद्या/ज्ञान
ददातिदा धातुलट्, प्र.पु.ए.देती है
विनयम्विनय (पुं.)द्वितीया ए.विनय/शिष्टाचार
विनयात्विनयपञ्चमी ए.विनय से
यातिया धातुलट्, प्र.पु.ए.जाती है/प्राप्त होती है
पात्रताम्पात्रता (स्त्री.)द्वितीया ए.पात्रता/योग्यता
पात्रत्वात्पात्रत्व (नपुं.)पञ्चमी ए.पात्रता से
धनम्धन (नपुं.)द्वितीया ए.धन
आप्नोतिआप् धातुलट्, प्र.पु.ए.प्राप्त करता है
धनात्धनपञ्चमी ए.धन से
धर्मम्धर्म (पुं.)द्वितीया ए.धर्म
ततःअव्ययउसके बाद/इसलिए
सुखम्सुख (नपुं.)द्वितीया ए.सुख

कारण-फल श्रृङ्खला

विद्या → विनय → पात्रता → धन → धर्म → सुख

अन्वय (गद्य-क्रम)

विद्या विनयं ददाति। विनयात् पात्रतां याति। पात्रत्वात् धनम् आप्नोति। धनात् धर्मं (ततः) सुखम् (आप्नोति)।

अनुवाद

विद्या विनय देती है। विनय से पात्रता आती है। पात्रता से धन मिलता है। धन से धर्म, और उससे सुख (मिलता है)।


श्लोक 2: सर्वे भवन्तु सुखिनः (शान्ति मन्त्र)

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥

पद-विश्लेषण

पदमूल शब्दविभक्ति/लकारअर्थ
सर्वेसर्वप्रथमा ब. (पुं.)सब
भवन्तुभू धातुलोट्, प्र.पु.ब.हों! (प्रार्थना)
सुखिनःसुखिन्प्रथमा ब.सुखी
सन्तुअस् धातुलोट्, प्र.पु.ब.हों!
निरामयाःनिरामयप्रथमा ब.निरोग/स्वस्थ
भद्राणिभद्रप्रथमा ब. (नपुं.)शुभ/मङ्गल
पश्यन्तुदृश् धातुलोट्, प्र.पु.ब.देखें!
माअव्ययन/मत
कश्चित्कश्चित्प्रथमा ए.कोई भी
दुःखभाक्दुःखभाज्प्रथमा ए.दुःख पाने वाला
भवेत्भू धातुविधिलिङ्, प्र.पु.ए.हो

व्याकरणिक विशेषताएँ

बिन्दुविवरण
लोट् लकारभवन्तु, सन्तु, पश्यन्तु — प्रार्थना
विधिलिङ्भवेत् — सम्भावना/इच्छा
मा + विधिलिङ्मा भवेत् — निषेध-प्रार्थना
हलन्त शब्दसुखिन् (न्-अन्त), दुःखभाज् (ज्-अन्त)
समासदुःखभाक् = दुःख + भाज् (तत्पुरुष)
नपुंसक बहुवचनभद्राणि (-आनि प्रत्यय)

अन्वय

सर्वे सुखिनः भवन्तु। सर्वे निरामयाः सन्तु। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। कश्चित् दुःखभाक् मा भवेत्।

अनुवाद

सब सुखी हों। सब निरोग हों। सब शुभ देखें। कोई भी दुःखी न हो।


श्लोक 3: कर्मण्येवाधिकारस्ते (गीता 2.47)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

सन्धि-विच्छेद

सन्धिविच्छेदनियम
कर्मण्येवाधिकारस्तेकर्मणि + एव + अधिकारः + तेइ+ए=ये (यण्), अ+अ=आ (दीर्घ), ः+त=स्त
कर्मफलहेतुर्भूःकर्मफलहेतुः + भूःः+भ=र्भ (विसर्ग)
मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणिमा + ते + सङ्गः + अस्तु + अकर्मणिः+अ=ओ+ऽ, उ+अ=व

पद-विश्लेषण

पदविश्लेषणअर्थ
कर्मणिकर्मन् (नपुं.), सप्तमी ए.कर्म में
एवअव्ययही (emphasis)
अधिकारःअधिकार (पुं.), प्रथमा ए.अधिकार
तेयुष्मद्, षष्ठी ए.तेरा
माअव्ययन/मत
फलेषुफल (नपुं.), सप्तमी ब.फलों में
कदाचनअव्ययकभी
कर्मफलहेतुःकर्मफल + हेतु (समास)कर्मफल का कारण
भूःभू धातु, लुङ्, म.पु.ए.हो (मत हो)
सङ्गःसङ्ग (पुं.), प्रथमा ए.आसक्ति
अस्तुअस् धातु, लोट्, प्र.पु.ए.हो
अकर्मणिअकर्मन् (नपुं.), सप्तमी ए.कर्म न करने में

समास-विग्रह

समासविग्रहप्रकार
कर्मफलकर्मणः फलम्तत्पुरुष (षष्ठी)
कर्मफलहेतुकर्मफलस्य हेतुःतत्पुरुष (षष्ठी)

अनुवाद

कर्म में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। कर्मफल का कारण मत बन। कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न हो।


विश्लेषण-विधि सार

किसी भी श्लोक का विश्लेषण इन चरणों में करें:

चरणकार्य
1सन्धि-विच्छेद — शब्दों को तोड़ें
2समास-विग्रह — समस्त पदों को खोलें
3पद-विश्लेषण — विभक्ति, लकार, लिङ्ग, वचन पहचानें
4अन्वय — गद्य-क्रम में लिखें
5अनुवाद — हिन्दी/अंग्रेज़ी में

याद रखें

  1. श्लोक-विश्लेषण = सन्धि → समास → विभक्ति → अन्वय → अनुवाद
  2. सन्धि-विच्छेद सबसे पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण चरण
  3. अन्वय = गद्य-क्रम — कर्ता + कर्म + क्रिया
  4. अभ्यास से सुभाषित, गीता, उपनिषद् स्वयं पढ़ सकेंगे
  5. यह मध्यम स्तर (intermediate) की समाप्ति है — अब पठन अभ्यास (Stage 3) का समय!

अभ्यास

प्रश्न 1 / 70 सही

'विद्या ददाति विनयम्' — इसमें 'ददाति' किस धातु का रूप है?