श्लोक विश्लेषण — समासिक पद्य वाचन
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श्लोक विश्लेषण — समासिक पद्य वाचन
यह capstone पाठ है — इसमें हम वास्तविक संस्कृत श्लोकों का सम्पूर्ण व्याकरणिक विश्लेषण करेंगे। इसमें इस स्तर तक पढ़े सभी व्याकरण-बिन्दुओं का प्रयोग दिखेगा: सन्धि, समास, कृदन्त, विभक्ति, वाच्य, लकार।
श्लोक 1: विद्या ददाति विनयम् (सुभाषित)
विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनम् आप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥
पद-विच्छेद
| सन्धि शब्द | विच्छेद | सन्धि नियम |
|---|---|---|
| विनयाद् | विनयात् | त् → द् (पद-अन्त नियम) |
| पात्रत्वाद् | पात्रत्वात् | त् → द् |
| धनम् आप्नोति | धनम् + आप्नोति | (कोई सन्धि नहीं) |
| धनाद् धर्मम् | धनात् + धर्मम् | त् → द् (ध् के पूर्व) |
पद-विश्लेषण
| पद | मूल शब्द | विभक्ति | अर्थ |
|---|---|---|---|
| विद्या | विद्या (स्त्री.) | प्रथमा ए. | विद्या/ज्ञान |
| ददाति | दा धातु | लट्, प्र.पु.ए. | देती है |
| विनयम् | विनय (पुं.) | द्वितीया ए. | विनय/शिष्टाचार |
| विनयात् | विनय | पञ्चमी ए. | विनय से |
| याति | या धातु | लट्, प्र.पु.ए. | जाती है/प्राप्त होती है |
| पात्रताम् | पात्रता (स्त्री.) | द्वितीया ए. | पात्रता/योग्यता |
| पात्रत्वात् | पात्रत्व (नपुं.) | पञ्चमी ए. | पात्रता से |
| धनम् | धन (नपुं.) | द्वितीया ए. | धन |
| आप्नोति | आप् धातु | लट्, प्र.पु.ए. | प्राप्त करता है |
| धनात् | धन | पञ्चमी ए. | धन से |
| धर्मम् | धर्म (पुं.) | द्वितीया ए. | धर्म |
| ततः | अव्यय | — | उसके बाद/इसलिए |
| सुखम् | सुख (नपुं.) | द्वितीया ए. | सुख |
कारण-फल श्रृङ्खला
विद्या → विनय → पात्रता → धन → धर्म → सुख
अन्वय (गद्य-क्रम)
विद्या विनयं ददाति। विनयात् पात्रतां याति। पात्रत्वात् धनम् आप्नोति। धनात् धर्मं (ततः) सुखम् (आप्नोति)।
अनुवाद
विद्या विनय देती है। विनय से पात्रता आती है। पात्रता से धन मिलता है। धन से धर्म, और उससे सुख (मिलता है)।
श्लोक 2: सर्वे भवन्तु सुखिनः (शान्ति मन्त्र)
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥
पद-विश्लेषण
| पद | मूल शब्द | विभक्ति/लकार | अर्थ |
|---|---|---|---|
| सर्वे | सर्व | प्रथमा ब. (पुं.) | सब |
| भवन्तु | भू धातु | लोट्, प्र.पु.ब. | हों! (प्रार्थना) |
| सुखिनः | सुखिन् | प्रथमा ब. | सुखी |
| सन्तु | अस् धातु | लोट्, प्र.पु.ब. | हों! |
| निरामयाः | निरामय | प्रथमा ब. | निरोग/स्वस्थ |
| भद्राणि | भद्र | प्रथमा ब. (नपुं.) | शुभ/मङ्गल |
| पश्यन्तु | दृश् धातु | लोट्, प्र.पु.ब. | देखें! |
| मा | अव्यय | — | न/मत |
| कश्चित् | कश्चित् | प्रथमा ए. | कोई भी |
| दुःखभाक् | दुःखभाज् | प्रथमा ए. | दुःख पाने वाला |
| भवेत् | भू धातु | विधिलिङ्, प्र.पु.ए. | हो |
व्याकरणिक विशेषताएँ
| बिन्दु | विवरण |
|---|---|
| लोट् लकार | भवन्तु, सन्तु, पश्यन्तु — प्रार्थना |
| विधिलिङ् | भवेत् — सम्भावना/इच्छा |
| मा + विधिलिङ् | मा भवेत् — निषेध-प्रार्थना |
| हलन्त शब्द | सुखिन् (न्-अन्त), दुःखभाज् (ज्-अन्त) |
| समास | दुःखभाक् = दुःख + भाज् (तत्पुरुष) |
| नपुंसक बहुवचन | भद्राणि (-आनि प्रत्यय) |
अन्वय
सर्वे सुखिनः भवन्तु। सर्वे निरामयाः सन्तु। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। कश्चित् दुःखभाक् मा भवेत्।
अनुवाद
सब सुखी हों। सब निरोग हों। सब शुभ देखें। कोई भी दुःखी न हो।
श्लोक 3: कर्मण्येवाधिकारस्ते (गीता 2.47)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
सन्धि-विच्छेद
| सन्धि | विच्छेद | नियम |
|---|---|---|
| कर्मण्येवाधिकारस्ते | कर्मणि + एव + अधिकारः + ते | इ+ए=ये (यण्), अ+अ=आ (दीर्घ), ः+त=स्त |
| कर्मफलहेतुर्भूः | कर्मफलहेतुः + भूः | ः+भ=र्भ (विसर्ग) |
| मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि | मा + ते + सङ्गः + अस्तु + अकर्मणि | ः+अ=ओ+ऽ, उ+अ=व |
पद-विश्लेषण
| पद | विश्लेषण | अर्थ |
|---|---|---|
| कर्मणि | कर्मन् (नपुं.), सप्तमी ए. | कर्म में |
| एव | अव्यय | ही (emphasis) |
| अधिकारः | अधिकार (पुं.), प्रथमा ए. | अधिकार |
| ते | युष्मद्, षष्ठी ए. | तेरा |
| मा | अव्यय | न/मत |
| फलेषु | फल (नपुं.), सप्तमी ब. | फलों में |
| कदाचन | अव्यय | कभी |
| कर्मफलहेतुः | कर्मफल + हेतु (समास) | कर्मफल का कारण |
| भूः | भू धातु, लुङ्, म.पु.ए. | हो (मत हो) |
| सङ्गः | सङ्ग (पुं.), प्रथमा ए. | आसक्ति |
| अस्तु | अस् धातु, लोट्, प्र.पु.ए. | हो |
| अकर्मणि | अकर्मन् (नपुं.), सप्तमी ए. | कर्म न करने में |
समास-विग्रह
| समास | विग्रह | प्रकार |
|---|---|---|
| कर्मफल | कर्मणः फलम् | तत्पुरुष (षष्ठी) |
| कर्मफलहेतु | कर्मफलस्य हेतुः | तत्पुरुष (षष्ठी) |
अनुवाद
कर्म में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। कर्मफल का कारण मत बन। कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न हो।
विश्लेषण-विधि सार
किसी भी श्लोक का विश्लेषण इन चरणों में करें:
| चरण | कार्य |
|---|---|
| 1 | सन्धि-विच्छेद — शब्दों को तोड़ें |
| 2 | समास-विग्रह — समस्त पदों को खोलें |
| 3 | पद-विश्लेषण — विभक्ति, लकार, लिङ्ग, वचन पहचानें |
| 4 | अन्वय — गद्य-क्रम में लिखें |
| 5 | अनुवाद — हिन्दी/अंग्रेज़ी में |
याद रखें
- श्लोक-विश्लेषण = सन्धि → समास → विभक्ति → अन्वय → अनुवाद
- सन्धि-विच्छेद सबसे पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण चरण
- अन्वय = गद्य-क्रम — कर्ता + कर्म + क्रिया
- अभ्यास से सुभाषित, गीता, उपनिषद् स्वयं पढ़ सकेंगे
- यह मध्यम स्तर (intermediate) की समाप्ति है — अब पठन अभ्यास (Stage 3) का समय!
अभ्यास
'विद्या ददाति विनयम्' — इसमें 'ददाति' किस धातु का रूप है?