सुभाषित सरल
उत्साहसम्पन्नम् — लक्ष्मी का निवास
मूल पाठ
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च
लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः॥
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च
लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः॥
यह सुभाषित बताता है कि सफलता (लक्ष्मी) उसे स्वयं प्राप्त होती है जिसमें ये सात गुण हों। इस श्लोक में अनेक समास (compound words) हैं।
व्याकरण विशेष — समास पहचानें
इस श्लोक की विशेषता है कि लगभग हर विशेषण एक समास (compound word) है:
| समास | विच्छेद | प्रकार | अर्थ |
|---|---|---|---|
| उत्साहसम्पन्नम् | उत्साहेन सम्पन्नम् | तृतीया तत्पुरुष | उत्साह से युक्त |
| अदीर्घसूत्रम् | न दीर्घसूत्रम् | नञ् तत्पुरुष | विलम्ब न करने वाला |
| क्रियाविधिज्ञम् | क्रियायाः विधिम् जानाति इति | उपपद तत्पुरुष | कार्य-विधि जानने वाला |
| दृढसौहृदम् | दृढम् सौहृदम् यस्य | बहुव्रीहि | जिसकी मित्रता दृढ़ हो |
| निवासहेतोः | निवासस्य हेतोः | षष्ठी तत्पुरुष | निवास के कारण/लिए |
विभक्ति अभ्यास
- व्यसनेषु — व्यसन शब्द, सप्तमी विभक्ति बहुवचन (= में)
- निवासहेतोः — हेतु शब्द, पञ्चमी विभक्ति एकवचन (= के लिए/कारण)
- सभी विशेषण (उत्साहसम्पन्नम्, शूरम् आदि) द्वितीया विभक्ति में हैं — वे ‘पुरुषम्’ को विशेषित करते हैं (जो श्लोक में अध्याहृत/implied है)