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सुभाषित सरल

उद्यमेन हि सिध्यन्ति — पुरुषार्थ

मूल पाठ

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

यह अत्यन्त प्रसिद्ध सुभाषित पुरुषार्थ (प्रयत्न) की महिमा बताता है। दूसरी पंक्ति में एक सुन्दर दृष्टान्त (उदाहरण) दिया गया है — सिंह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि वह सोता रहे तो शिकार स्वयं उसके मुख में नहीं आएगा। इसी प्रकार केवल इच्छा करने से कार्य सिद्ध नहीं होते — प्रयत्न आवश्यक है।

व्याकरण विशेष

  • उद्यमेन — उद्यम शब्द, तृतीया विभक्ति एकवचन (= से, द्वारा)। यहाँ करण कारक — “प्रयत्न के द्वारा”
  • सिध्यन्ति — सिध् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन (= सिद्ध होते हैं)
  • कार्याणि — कार्य शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा विभक्ति बहुवचन
  • मनोरथैः — मनोरथ शब्द, तृतीया विभक्ति बहुवचन (= इच्छाओं से)। मनोरथ = मनस् + रथ (षष्ठी तत्पुरुष — मन का रथ = कल्पना)
  • सुप्तस्य — सुप्त (सो गया), षष्ठी विभक्ति एकवचन (= सोए हुए का)
  • सिंहस्य — सिंह शब्द, षष्ठी विभक्ति एकवचन (= सिंह का)
  • मुखे — मुख शब्द, सप्तमी विभक्ति एकवचन (= मुख में)
  • प्रविशन्ति — प्र + विश् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन (= प्रवेश करते हैं)