सुभाषित सरल
सुखस्य मूलं धर्मः — सुख का मूल
मूल पाठ
धर्मस्य मूलमर्थः च अर्थस्य मूलमिन्द्रियजयः।
इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥
इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥
यह सुभाषित एक शृंखला (chain) प्रस्तुत करता है — प्रत्येक गुण का मूल दूसरे गुण में है। यह कौटिल्य के अर्थशास्त्र की शैली में है, जहाँ एक व्यवस्थित क्रम में जीवन के मूल्यों को जोड़ा गया है:
वृद्धोपसेवा → विनय → इन्द्रियजय → अर्थ → धर्म
अर्थात् बड़ों की सेवा से विनम्रता आती है, विनम्रता से इन्द्रियसंयम, इन्द्रियसंयम से धन की प्राप्ति, और धन से धर्म का पालन सम्भव होता है।
व्याकरण विशेष
- मूलमर्थः — मूलम् + अर्थः = मूलमर्थः (म् + अ — कोई सन्धि परिवर्तन नहीं, म् का अनुस्वार/म् बना रहता है)
- मूलमिन्द्रियजयः — मूलम् + इन्द्रियजयः (म् + इ)
- इन्द्रियजयः — इन्द्रिय + जय, षष्ठी तत्पुरुष समास (= इन्द्रियों की जय)
- इन्द्रियजयस्य — इन्द्रियजय शब्द, षष्ठी एकवचन (= इन्द्रियजय का)
- वृद्धोपसेवा — वृद्ध + उपसेवा = वृद्धोपसेवा (गुण सन्धि: अ + उ = ओ)। षष्ठी तत्पुरुष (= वृद्धों की सेवा)
- विनयः — वि + नी + अच् प्रत्यय = विनय (= शिष्टता, विनम्रता)
- इस श्लोक में षष्ठी विभक्ति (= “का/की/के”) का बार-बार प्रयोग है — यह सम्बन्ध बताने के लिए है