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सुभाषित सरल

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् — सत्य और प्रियता

मूल पाठ

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥

यह मनुस्मृति (4.138) का प्रसिद्ध श्लोक है जो वाणी के धर्म को बताता है। इसमें चार नियम दिए गए हैं — (1) सत्य बोलो, (2) प्रिय बोलो, (3) कड़वा सत्य मत बोलो, (4) मीठा झूठ भी मत बोलो। सत्य और प्रियता दोनों का संगम ही उत्तम वाणी है।

व्याकरण विशेष

  • ब्रूयात् — ब्रू धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= बोले, बोलना चाहिए)। विधिलिङ् का प्रयोग कर्तव्य/आदेश के लिए होता है।
  • अप्रियम् — न + प्रिय = अप्रिय, नञ् तत्पुरुष समास (= अप्रिय, जो प्रिय नहीं है)
  • अनृतम् — न + ऋत = अनृत, नञ् तत्पुरुष समास (= असत्य)
  • सनातनः — सनातन शब्द, प्रथमा विभक्ति एकवचन (= शाश्वत, सदा से चला आ रहा)
  • एषः — एतद् सर्वनाम, प्रथमा विभक्ति एकवचन, पुल्लिङ्ग

सन्धि अभ्यास

सन्धि रूपविच्छेदनियम
सत्यमप्रियम्सत्यम् + अप्रियम्म् + अ = म (अनुस्वार सन्धि)
नानृतम्न + अनृतम्आ + अ = आ (दीर्घ स्वर सन्धि)