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सुभाषित सरल

सर्वं परवशं दुःखम् — स्वावलम्बन

मूल पाठ

सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥

यह श्लोक मनुस्मृति से लिया गया है और स्वावलम्बन (self-reliance) की शिक्षा देता है। इसमें सुख और दुःख की अत्यन्त सरल परिभाषा दी गई है — जो परतन्त्र है वही दुःख है, जो स्वतन्त्र है वही सुख है।

व्याकरण विशेष

  • परवशम् — पर + वश, तत्पुरुष समास। पर = दूसरा, वश = अधीन। “दूसरों के वश में”
  • आत्मवशम् — आत्मन् + वश, तत्पुरुष समास। “अपने वश में”
  • विद्यात् — विद् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= जानना चाहिए)। विधिलिङ् का प्रयोग आदेश/उपदेश के लिए होता है।
  • समासेन — समास शब्द, तृतीया विभक्ति एकवचन (= से, द्वारा)
  • सुखदुःखयोः — सुख-दुःख, द्वन्द्व समास, षष्ठी विभक्ति द्विवचन (= सुख और दुःख का)
  • एतत् — एतद् सर्वनाम, प्रथमा विभक्ति एकवचन, नपुंसकलिङ्ग