सुभाषित सरल
कष्टं शीलम् — चरित्र कठिन है
मूल पाठ
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥
यह सुभाषित दुर्लभता का वर्णन करता है — जैसे हर पर्वत पर रत्न नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक में गजमुक्ता नहीं होता, और हर वन में चन्दन नहीं होता, वैसे ही सज्जन सब जगह नहीं मिलते। जो श्रेष्ठ है वह दुर्लभ होता है।
प्राचीन भारतीय मान्यता के अनुसार हाथी के मस्तक में गजमुक्ता (गज-मोती) होता है — यह एक काव्यात्मक कल्पना है।
व्याकरण विशेष
- शैले शैले — शैल शब्द, सप्तमी एकवचन की पुनरुक्ति (= प्रत्येक पर्वत पर)। संस्कृत में सप्तमी की पुनरुक्ति “प्रत्येक” अर्थ देती है
- माणिक्यम् — माणिक्य शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा एकवचन (= मणि, रत्न)
- मौक्तिकम् — मुक्ता + ठक् प्रत्यय = मौक्तिक (= मोती)। नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा एकवचन
- गजे गजे — गज शब्द, सप्तमी एकवचन की पुनरुक्ति (= हर हाथी में)
- साधवः — साधु शब्द, प्रथमा बहुवचन (= सज्जन)
- सर्वत्र — सर्व + त्र (प्रकार), अव्यय (= सब जगह)
- चन्दनम् — चन्दन शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा एकवचन
- वने वने — वन शब्द, सप्तमी एकवचन की पुनरुक्ति (= हर वन में)
- इस श्लोक में न (निषेधार्थक) का चार बार प्रयोग — प्रत्येक पंक्ति में एक बार