सुभाषित सरल
आयुषः क्षण एकोऽपि — समय का मूल्य
मूल पाठ
आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते।
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो॥
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो॥
यह सुभाषित समय की अमूल्यता बताता है। संसार के सारे रत्न मिलकर भी जीवन का एक क्षण नहीं खरीद सकते — फिर भी मनुष्य अपना समय व्यर्थ गँवाता है। यह प्रमाद (लापरवाही) कितनी बड़ी है!
व्याकरण विशेष
- आयुषः — आयुस् शब्द (नपुंसकलिङ्ग), षष्ठी विभक्ति एकवचन (= का)
- सर्वरत्नैः — सर्व-रत्न, तत्पुरुष समास, तृतीया विभक्ति बहुवचन (= सब रत्नों से)
- लभ्यते — लभ् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार (= प्राप्त किया जाता है)
- नीयते — नी धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार (= ले जाया जाता है)
- सुमहान् — सु (उपसर्ग = अत्यन्त) + महत् शब्द, प्रथमा विभक्ति एकवचन
सन्धि अभ्यास
| सन्धि रूप | विच्छेद | नियम |
|---|---|---|
| एकोऽपि | एकः + अपि | विसर्ग + अ = ओ + ऽ (विसर्ग सन्धि) |
| सर्वरत्नैर्न | सर्वरत्नैः + न | विसर्ग + न = र् + न (विसर्ग → र्) |
| सुमहानहो | सुमहान् + अहो | न् + अ = ना (व्यञ्जन सन्धि) |