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स्तोत्र मध्यम

विष्णु स्तुति — शान्ताकारम्

मूल पाठ

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

यह विष्णु स्तुति का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है। इसका छन्द मन्दाक्रान्ता है — एक अत्यन्त मधुर और गम्भीर वृत्त। इस एक श्लोक में भगवान विष्णु के बारह विशेषणों का वर्णन है — उनके स्वरूप, गुण और महिमा का सम्पूर्ण चित्रण।

यह श्लोक प्रातःकाल की प्रार्थना और पूजा में विशेष रूप से पढ़ा जाता है। इसमें विष्णु के अनेक प्रसिद्ध रूपों का उल्लेख है — शेषशायी (शेषनाग पर लेटे), पद्मनाभ (नाभि से कमल), लक्ष्मीकान्त (लक्ष्मी के पति)।

व्याकरण विशेष

  • शान्ताकारम् — शान्त + आकार = शान्ताकार (दीर्घ सन्धि: अ + आ = आ), बहुव्रीहि (= जिसका आकार शान्त है), द्वितीया एकवचन
  • भुजगशयनम् — भुजग + शयन, सप्तमी तत्पुरुष (= भुजग/सर्प पर शयन), द्वितीया
  • पद्मनाभम् — पद्म + नाभ, बहुव्रीहि (= जिसकी नाभि में पद्म/कमल है)
  • सुरेशम् — सुर + ईश = सुरेश (गुण सन्धि: अ + ई = ए), द्वितीया
  • विश्वाधारम् — विश्व + आधार = विश्वाधार (दीर्घ सन्धि), बहुव्रीहि
  • गगनसदृशम् — गगन + सदृश (= आकाश के समान), उपमान-उपमेय समास
  • योगिभिर्ध्यानगम्यम् — योगिभिः + ध्यानगम्यम् (विसर्ग → र् + ध)। ध्यान + गम्य (गम् + यत्) = ध्यान से प्राप्य
  • वन्दे — वन्द् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन, आत्मनेपद (= वन्दना करता हूँ)
  • भवभयहरम् — भव + भय + हर, बहुपदी तत्पुरुष (= संसार के भय को हरने वाला)
  • सर्वलोकैकनाथम् — सर्व + लोक + एक + नाथ, बहुव्रीहि। लोक + एक = लोकैक (वृद्धि: अ + ए = ऐ)