स्तोत्र मध्यम
सुभाषित रत्नावली — ज्ञान रत्न
मूल पाठ
अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतः सुखम्॥
अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतः सुखम्॥
यह सुभाषित रत्नावली का एक अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है। इसमें एक शृंखला (chain reaction) प्रस्तुत की गई है — आलस्य से विद्या नहीं, विद्या के बिना धन नहीं, धन के बिना मित्र नहीं, और मित्र के बिना सुख नहीं। यह श्लोक आलस्य को सब दुःखों का मूल बताता है।
शृंखला का क्रम: आलस्य → विद्या का अभाव → धन का अभाव → मित्रों का अभाव → सुख का अभाव
इस प्रकार आलस्य एक ऐसी शृंखला प्रारम्भ करता है जो अन्ततः सुख के पूर्ण अभाव में समाप्त होती है। इसलिए आलस्य का त्याग ही सुख का प्रथम चरण है।
व्याकरण विशेष
- अलसस्य — अलस शब्द (= आलसी), षष्ठी एकवचन (= आलसी का)
- कुतः — प्रश्नवाचक अव्यय (= कहाँ से)। यहाँ आलंकारिक प्रश्न (rhetorical question) है — उत्तर “कहीं से नहीं” है
- अविद्यस्य — अ + विद्या = अविद्य (नञ् तत्पुरुष = विद्याहीन), षष्ठी एकवचन
- अधनस्य — अ + धन = अधन (नञ् तत्पुरुष = धनहीन), षष्ठी एकवचन
- अमित्रस्य — अ + मित्र = अमित्र (नञ् तत्पुरुष = मित्रहीन), षष्ठी एकवचन
- इस श्लोक में चार नञ् तत्पुरुष समास हैं — अलस (आलसी), अविद्य (विद्याहीन), अधन (धनहीन), अमित्र (मित्रहीन)
- चारों पंक्तियों में एक ही संरचना है: षष्ठी + कुतः + प्रथमा — यह आलंकारिक प्रश्न (अर्थालंकार) का उदाहरण है
- सभी “कुतः” प्रश्न निषेधार्थक हैं — “कहाँ से?” = “कहीं से नहीं!”