स्तोत्र सरल
शान्ति मन्त्र — ॐ सह नाववतु
मूल पाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
यह प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय उपनिषद् से है। यह गुरु-शिष्य सम्बन्ध की प्रार्थना है — अध्ययन के आरम्भ में बोला जाता है।
व्याकरण विशेष — द्विवचन
इस मन्त्र की विशेषता द्विवचन (dual number) का प्रयोग है। गुरु और शिष्य — दो व्यक्ति — इसलिए द्विवचन:
| शब्द | विश्लेषण | विशेष |
|---|---|---|
| नौ | अस्मद् (मैं/हम) का द्वितीया/चतुर्थी द्विवचन | = हम दोनों को/के लिए |
| करवावहै | कृ धातु, लोट् लकार, उत्तम पुरुष द्विवचन | = हम दोनों करें |
| विद्विषावहै | विद्विष् धातु, लोट् लकार, उत्तम पुरुष द्विवचन | = हम दोनों द्वेष करें |
| तेजस्विनौ | तेजस्विन् शब्द, प्रथमा द्विवचन | = दोनों तेजस्वी |
सन्धि अभ्यास
| सन्धि रूप | विच्छेद | नियम |
|---|---|---|
| नाववतु | नौ + अवतु | औ + अ = आव (सन्धि) |
| तेजस्विनावधीतम् | तेजस्विनौ + अधीतम् | औ + अ = आव |
| विद्विषावहै | यह एक पद है | आवहै = उ.पु.द्वि. प्रत्यय |
शान्तिः तीन बार क्यों?
शान्तिः तीन बार बोला जाता है — तीन प्रकार के ताप (दुःख) की शान्ति के लिए:
- आध्यात्मिक — शरीर और मन से उत्पन्न
- आधिभौतिक — अन्य प्राणियों से उत्पन्न
- आधिदैविक — प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न