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स्तोत्र मध्यम

सरस्वती वन्दना — या कुन्देन्दुतुषारहारधवला

मूल पाठ

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

यह सरस्वती वन्दना का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है जो विद्यारम्भ और पूजा में बोला जाता है। यह श्लोक शार्दूलविक्रीडित छन्द में है (प्रत्येक पंक्ति में 19 अक्षर)। इसमें सरस्वती देवी के स्वरूप का सुन्दर वर्णन है — उनकी श्वेत छवि, वीणा, और उनकी सर्वदेव-वन्दिता महिमा।

व्याकरण विशेष — समास विश्लेषण

इस श्लोक की सबसे बड़ी विशेषता दीर्घ समास (long compound words) हैं। आइए उन्हें तोड़कर समझें:

समासविच्छेदप्रकारअर्थ
कुन्देन्दुतुषारहारधवलाकुन्दम् च इन्दुः च तुषारम् च हारः च — (इव) धवलाबहुव्रीहिकुन्द, चन्द्र, बर्फ, हार जैसी श्वेत
शुभ्रवस्त्रावृताशुभ्रेण वस्त्रेण आवृतातृतीया तत्पुरुषश्वेत वस्त्र से ढकी
वीणावरदण्डमण्डितकरावीणायाः वरः दण्डः (तेन) मण्डितः करः यस्याः साबहुव्रीहिवीणा के दण्ड से सुशोभित हाथ वाली
श्वेतपद्मासनाश्वेतम् पद्मम् आसनम् यस्याः साबहुव्रीहिश्वेत कमल है आसन जिसका
निःशेषजाड्यापहानिःशेषम् जाड्यम् अपहन्ति इतिउपपद तत्पुरुषसम्पूर्ण जड़ता का नाश करने वाली

या…सा संरचना

इस श्लोक में या…सा (जो…वह) सम्बन्धवाचक सर्वनाम की पुनरावृत्ति से सुन्दर काव्य प्रवाह बनता है:

  • या (जो) — चार बार प्रयोग, हर बार एक नया विशेषण
  • सा (वह) — अन्त में एक बार, सभी विशेषणों को समेटते हुए

यह संस्कृत काव्य की एक प्रसिद्ध शैली है।

सन्धि अभ्यास

सन्धि रूपविच्छेदनियम
कुन्देन्दुकुन्द + इन्दुअ + इ = ए (गुण सन्धि)
शुभ्रवस्त्रावृताशुभ्रवस्त्र + आवृताअ + आ = आ (दीर्घ सन्धि)
श्वेतपद्मासनाश्वेतपद्म + आसनाअ + आ = आ (दीर्घ सन्धि)
ब्रह्माच्युतब्रह्मा + अच्युतआ + अ = आ (दीर्घ सन्धि)
प्रभृतिभिर्देवैःप्रभृतिभिः + देवैःविसर्ग + द = र् + द (विसर्ग → र्)
निःशेषनिस् + शेषस् + श = ः + श (विसर्ग)
जाड्यापहाजाड्य + अपहाअ + अ = आ (दीर्घ सन्धि)