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स्तोत्र सरल

गुरु वन्दना — गुरु ब्रह्मा

मूल पाठ

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

यह गुरु वन्दना का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है। भारतीय परम्परा में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है — गुरु को त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) से भी बढ़कर, साक्षात् परब्रह्म माना गया है। यह श्लोक गुरुगीता से लिया गया है।

गुरु की तीन भूमिकाएँ:

  • ब्रह्मा — गुरु नवीन ज्ञान की सृष्टि करते हैं
  • विष्णु — गुरु शिष्य का पालन और मार्गदर्शन करते हैं
  • महेश्वर — गुरु शिष्य के अज्ञान का संहार करते हैं

व्याकरण विशेष

  • गुरुर्ब्रह्मा — गुरुः + ब्रह्मा = गुरुर्ब्रह्मा (विसर्ग → र् + ब)
  • गुरुर्विष्णुः — गुरुः + विष्णुः = गुरुर्विष्णुः (विसर्ग → र् + व)
  • गुरुर्देवो — गुरुः + देवः = गुरुर्देवो (विसर्ग → र्; विसर्ग → ओ)
  • महेश्वरः — महा + ईश्वर = महेश्वर (गुण सन्धि: आ + ई = ए)। प्रथमा एकवचन
  • साक्षात् — स + अक्षि + आत् (= आँखों के सामने, प्रत्यक्ष)। अव्यय
  • परम् ब्रह्म — परम (= सर्वोच्च) + ब्रह्म (= निर्गुण परमात्मा)। “ब्रह्मा” (पुल्लिङ्ग, सगुण) और “ब्रह्म” (नपुंसकलिङ्ग, निर्गुण) में अन्तर ध्यान दें
  • तस्मै — तद् शब्द, चतुर्थी एकवचन (= उनको)
  • गुरवे — गुरु शब्द, चतुर्थी एकवचन (= गुरु को)। “नमः” के साथ चतुर्थी विभक्ति लगती है
  • नमः — अव्यय (= नमस्कार)। नमः + चतुर्थी = किसी को नमस्कार