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स्तोत्र सरल

गायत्री मन्त्र — ॐ भूर्भुवः स्वः

मूल पाठ

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

गायत्री मन्त्र वैदिक साहित्य का सर्वाधिक पवित्र और प्रसिद्ध मन्त्र है। यह ऋग्वेद (3.62.10) में विश्वामित्र ऋषि द्वारा दृष्ट है। इसके तीन भाग हैं — प्रथम महाव्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः), फिर ध्यान (सवितृ देव के तेज का), और अन्त में प्रार्थना (बुद्धि की प्रेरणा के लिए)। इसका छन्द गायत्री है — 24 अक्षरों का (8+8+8)।

व्याकरण विशेष

  • सवितुः — सवितृ शब्द (ऋकारान्त), षष्ठी विभक्ति एकवचन (= सविता का)। सवितृ = सूर्य, प्रेरक देवता
  • वरेण्यम् — वृ धातु + एण्य प्रत्यय (= वरण करने योग्य, श्रेष्ठ)
  • भर्गः — भर्गस् शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा विभक्ति एकवचन (= तेज, ज्योति)
  • देवस्य — देव शब्द, षष्ठी विभक्ति एकवचन (= देव का)
  • धीमहि — धी/ध्यै धातु, लोट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन (= हम ध्यान करें)
  • धियः — धी शब्द (स्त्रीलिङ्ग), द्वितीया विभक्ति बहुवचन (= बुद्धियों को)
  • प्रचोदयात् — प्र + चुद् (णिजन्त), विधिलिङ् / आशीर्लिङ्, प्रथम पुरुष एकवचन (= प्रेरित करे)

महाव्याहृतियाँ

भूः भुवः स्वः — ये तीन व्याहृतियाँ तीन लोकों का प्रतिनिधित्व करती हैं:

व्याहृतिलोकअर्थ
भूःभूलोकपृथ्वी
भुवःभुवर्लोकअन्तरिक्ष
स्वःस्वर्लोकस्वर्ग

सन्धि अभ्यास

सन्धि रूपविच्छेदनियम
भूर्भुवःभूः + भुवःविसर्ग + भ = र् + भ (विसर्ग → र्)
तत्सवितुर्वरेण्यम्तत् + सवितुः + वरेण्यम्सवितुः + व = सवितुर् + व (विसर्ग → र्)