स्तोत्र सरल
गणेश वन्दना — वक्रतुण्ड
मूल पाठ
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
यह गणेश वन्दना का सर्वाधिक लोकप्रिय श्लोक है। भारतीय परम्परा में किसी भी शुभ कार्य के प्रारम्भ में गणेश जी की वन्दना की जाती है क्योंकि वे विघ्नहर्ता (बाधाओं को दूर करने वाले) हैं। यह श्लोक अत्यन्त सरल है और नए संस्कृत शिक्षार्थियों के लिए आदर्श प्रारम्भिक पाठ है।
श्लोक में गणेश जी के तीन विशेषण हैं:
- वक्रतुण्ड — टेढ़ी सूँड वाले (गणेश का प्रसिद्ध चिह्न)
- महाकाय — विशाल शरीर वाले
- सूर्यकोटिसमप्रभ — करोड़ सूर्यों जैसा तेज
व्याकरण विशेष
- वक्रतुण्ड — वक्र + तुण्ड, बहुव्रीहि समास (= जिसकी तुण्ड/सूँड वक्र है), सम्बोधन एकवचन
- महाकाय — महत् + काय = महाकाय, बहुव्रीहि (= जिसका शरीर विशाल है)। महत् → महा (समास में)
- सूर्यकोटिसमप्रभ — सूर्य + कोटि + सम + प्रभा, बहुव्रीहि समास (= करोड़ सूर्यों के समान प्रभा वाला)। बहुपदी बहुव्रीहि
- निर्विघ्नम् — निः + विघ्न = निर्विघ्न (विसर्ग → र् + व; नञ् तत्पुरुष), द्वितीया एकवचन (= विघ्नरहित)
- कुरु — कृ धातु (8वाँ गण), लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन (= करो)
- मे — अस्मद् शब्द, षष्ठी/चतुर्थी एकवचन (= मेरे/मेरे लिए)
- सर्वकार्येषु — सर्व + कार्य, कर्मधारय समास, सप्तमी बहुवचन
- सर्वदा — सर्व + दा (प्रत्यय), अव्यय (= सदा, हमेशा)