स्तोत्र मध्यम
देवी स्तुति — या देवी सर्वभूतेषु
मूल पाठ
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
यह दुर्गासप्तशती (मार्कण्डेय पुराण) का अत्यन्त प्रसिद्ध स्तुति-श्लोक है। इस श्लोक का प्रयोग नवरात्रि पूजा में विशेष रूप से होता है। मूल स्तोत्र में यही संरचना बार-बार आती है, केवल “शक्तिरूपेण” के स्थान पर भिन्न-भिन्न रूप आते हैं — बुद्धिरूपेण, निद्रारूपेण, क्षुधारूपेण, छायारूपेण, श्रद्धारूपेण, इत्यादि।
यह श्लोक शाक्त दर्शन का सार है — सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त शक्ति ही देवी हैं। “नमस्तस्यै” की त्रिपुनरुक्ति भक्ति की तीव्रता और आदर की गहनता प्रकट करती है।
व्याकरण विशेष
- या — यद् शब्द, प्रथमा स्त्रीलिङ्ग एकवचन (= जो)। सम्बन्धवाचक सर्वनाम
- सर्वभूतेषु — सर्व + भूत, कर्मधारय समास, सप्तमी बहुवचन (= सब प्राणियों में)
- शक्तिरूपेण — शक्ति + रूप, तृतीया एकवचन (= शक्ति के रूप में)। तृतीया विभक्ति यहाँ “के रूप में” अर्थ देती है
- संस्थिता — सम् + स्था + क्त = संस्थित, स्त्रीलिङ्ग (= स्थित, विराजमान)
- नमस्तस्यै — नमः + तस्यै = नमस्तस्यै (विसर्ग + त = स्त)
- तस्यै — तद् शब्द, चतुर्थी स्त्रीलिङ्ग एकवचन (= उनको)। “नमः” के साथ चतुर्थी विभक्ति
- नमो नमः — नमः + नमः = नमो नमः (विसर्ग + न = ओ + न)। पुनरुक्ति = बार-बार नमस्कार
इस स्तोत्र के अन्य रूप
| रूप | अर्थ |
|---|---|
| शक्तिरूपेण | शक्ति के रूप में |
| बुद्धिरूपेण | बुद्धि के रूप में |
| निद्रारूपेण | निद्रा के रूप में |
| क्षुधारूपेण | भूख के रूप में |
| श्रद्धारूपेण | श्रद्धा के रूप में |
| लक्ष्मीरूपेण | लक्ष्मी के रूप में |