पञ्चतन्त्र मध्यम
वानर-नक्र कथा — बुद्धि की विजय
मूल पाठ
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।
वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥
नदीतीरे वसत्येको वानरो वृक्षवासिनाम्।
तस्य मित्रं जले जातः नक्रः दुष्टमनोरथः॥
वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥
नदीतीरे वसत्येको वानरो वृक्षवासिनाम्।
तस्य मित्रं जले जातः नक्रः दुष्टमनोरथः॥
यह कथा पञ्चतन्त्र के मित्रभेद तन्त्र से ली गई है। यह संस्कृत साहित्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध कथाओं में से एक है।
कथा का सार — एक नदी के किनारे जामुन के वृक्ष पर एक वानर रहता था। एक मगरमच्छ (नक्र) उसके वृक्ष के नीचे आया और दोनों में मित्रता हो गई। वानर प्रतिदिन नक्र को मीठे फल देता था। नक्र की पत्नी ने सोचा कि जो वानर इतने मीठे फल खाता है, उसका हृदय भी अवश्य मीठा होगा — वह खाना चाहती थी। नक्र ने छल से वानर को अपनी पीठ पर बैठाकर नदी में ले जाने का प्रयास किया। किन्तु चतुर वानर ने कहा — “अरे! मेरा हृदय तो मैंने वृक्ष पर ही छोड़ दिया है, चलो वापस लेकर आते हैं।” मूर्ख नक्र वापस किनारे आया और वानर वृक्ष पर कूदकर बच गया।
प्रथम श्लोक इस कथा का प्रसिद्ध नीतिवचन है — “बुद्धिर्यस्य बलं तस्य” — जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास सच्चा बल है।
व्याकरण विशेष
- बुद्धिर्यस्य — बुद्धिः + यस्य, विसर्ग सन्धि (रुत्व), यस्य = जिसका (यत् सर्वनाम, षष्ठी एकवचन)
- निर्बुद्धेः — निर् + बुद्धि, नञ् तत्पुरुष समास, षष्ठी विभक्ति एकवचन (= बुद्धिहीन का)
- मदोन्मत्तः — मद + उन्मत्त, तृतीया तत्पुरुष (मद से उन्मत्त), गुण सन्धि (अ + उ = ओ)
- शशकेन — शशक शब्द, तृतीया विभक्ति एकवचन (= खरगोश द्वारा), करण कारक
- निपातितः — नि + पत् (णिजन्त) धातु का क्त प्रत्ययान्त रूप (= गिराया गया)
- वसति — वस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= रहता है)
- दुष्टमनोरथः — दुष्ट + मनोरथ, कर्मधारय समास (= दुष्ट इच्छा वाला)