पञ्चतन्त्र मध्यम
मित्रभेद — पञ्चतन्त्र प्रथम तन्त्र
मूल पाठ
अस्ति दक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम्।
तत्र सर्वसम्पत्समन्वितो राजा अमरशक्तिर्नाम बभूव॥
तस्य त्रयः पुत्रा बहुश्रुताः परमदुर्मेधसो बभूवुः।
अथ स राजा पण्डितान् समाहूय प्रोवाच॥
तत्र सर्वसम्पत्समन्वितो राजा अमरशक्तिर्नाम बभूव॥
तस्य त्रयः पुत्रा बहुश्रुताः परमदुर्मेधसो बभूवुः।
अथ स राजा पण्डितान् समाहूय प्रोवाच॥
पञ्चतन्त्र संस्कृत साहित्य का सर्वाधिक प्रसिद्ध कथाग्रन्थ है। इसकी रचना आचार्य विष्णु शर्मा ने की थी। इस ग्रन्थ की रचना का उद्देश्य तीन मूर्ख राजकुमारों को नीतिशास्त्र सिखाना था — और वह भी छह मास के भीतर!
पञ्चतन्त्र के पाँच तन्त्र (भाग) हैं:
- मित्रभेद — मित्रों में फूट कैसे पड़ती है
- मित्रसम्प्राप्ति — मित्र कैसे बनाए जाते हैं
- काकोलूकीय — कौवों और उल्लुओं की कथा (युद्ध-नीति)
- लब्धप्रणाश — प्राप्त वस्तु का नष्ट होना
- अपरीक्षितकारक — बिना सोचे-समझे कार्य करना
प्रस्तुत अंश पञ्चतन्त्र की कथामुखी (frame story) है। यह बताता है कि किस प्रकार राजा अमरशक्ति ने अपने मूर्ख पुत्रों को शिक्षित करने के लिए विष्णु शर्मा नामक विद्वान को नियुक्त किया। विष्णु शर्मा ने कथाओं के माध्यम से उन राजकुमारों को नीति सिखाई। मित्रभेद पहला और सबसे बड़ा तन्त्र है।
व्याकरण विशेष
- दक्षिणात्ये — दक्षिणात्य शब्द, सप्तमी विभक्ति एकवचन (= दक्षिण प्रदेश के)
- जनपदे — जनपद शब्द, सप्तमी विभक्ति एकवचन (= प्रदेश में)
- बभूव — भू धातु, लिट् लकार (भूतकाल), प्रथम पुरुष एकवचन (= हुआ/था)
- बहुश्रुताः — बहु + श्रुत, बहुव्रीहि समास, प्रथमा बहुवचन (= जिन्होंने बहुत सुना/पढ़ा है)
- परमदुर्मेधसः — परम + दुर् + मेधस्, प्रथमा बहुवचन (= अत्यन्त मन्दबुद्धि)
- समाहूय — सम् + आ + ह्वे धातु, ल्यबन्त (= बुलाकर), पूर्वकालिक क्रिया
- प्रोवाच — प्र + वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= कहा)