पञ्चतन्त्र सरल
मैत्री सम्प्राप्ति — मित्रता की शक्ति
मूल पाठ
एकस्वभावो हि पुमान् स्वजातिषु विशेषतः।
सम्प्राप्ते तु क्षये तेषां न्यासमन्यत्र गच्छति॥
सम्प्राप्ते तु क्षये तेषां न्यासमन्यत्र गच्छति॥
यह पञ्चतन्त्र के द्वितीय तन्त्र मित्रसम्प्राप्ति से लिया गया श्लोक है। इस तन्त्र का विषय है — सच्चे मित्र कैसे बनाए जाते हैं। यह श्लोक बताता है कि समान स्वभाव वालों में स्वाभाविक मित्रता होती है।
पञ्चतन्त्र में मित्रता का सिद्धान्त यह है कि समान स्वभाव (एकस्वभाव) मित्रता का आधार है। कबूतर, कौआ, चूहा और कछुआ — ये चार भिन्न प्राणी केवल अपने सदाचरण और परस्पर विश्वास के कारण गहरे मित्र बनते हैं।
व्याकरण विशेष
- एकस्वभावः — एक + स्वभाव, बहुव्रीहि समास (= जिसका स्वभाव एक समान है)
- पुमान् — पुंस् शब्द (= पुरुष, व्यक्ति), प्रथमा एकवचन। अकारान्त नहीं — विशेष शब्द रूप
- स्वजातिषु — स्व + जाति, कर्मधारय समास, सप्तमी बहुवचन (= अपनी जाति वालों में)
- विशेषतः — विशेष + तस् (तसिल् प्रत्यय), अव्यय (= विशेष रूप से)
- सम्प्राप्ते — सम् + प्र + आप् + क्त = सम्प्राप्त, सप्तमी एकवचन। यह सति सप्तमी (locative absolute) का प्रयोग है (= प्राप्त होने पर)
- क्षये — क्षय शब्द, सप्तमी एकवचन (= क्षय में, नाश होने पर)
- न्यासम् — नि + अस् धातु + घञ् = न्यास (= जमा रखी वस्तु, धरोहर), द्वितीया एकवचन
- अन्यत्र — अन्य + त्र (प्रत्यय), अव्यय (= कहीं और)