पञ्चतन्त्र मध्यम
लब्धप्रनाशम् — पाए हुए का नाश
मूल पाठ
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति॥
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति॥
यह पञ्चतन्त्र के चतुर्थ तन्त्र लब्धप्रणाश (प्राप्त का नाश) से लिया गया अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है। यह दूरदर्शिता और प्रत्युत्पन्नमति (presence of mind) का महत्त्व बताता है।
इस श्लोक में तीन प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन है:
- अनागतविधाता — जो भविष्य की योजना बनाता है (proactive)
- प्रत्युत्पन्नमति — जो तत्काल बुद्धि से काम लेता है (reactive but wise)
- यद्भविष्य — जो कहता है “जो होगा सो होगा” (fatalist)
पहले दो सुखी रहते हैं, तीसरा नष्ट हो जाता है। शिक्षा — भाग्य पर निर्भर न रहो, पूर्वनियोजन और बुद्धि से काम लो।
व्याकरण विशेष
- अनागतविधाता — अन् + आगत + विधाता, बहुव्रीहि समास (= जो अनागत/भविष्य का विधान करता है)। विधाता = विधि करने वाला (धा + तृच्)
- प्रत्युत्पन्नमतिः — प्रत्युत्पन्न + मति, बहुव्रीहि समास (= जिसकी मति प्रत्युत्पन्न/तत्काल है)। प्रति + उत् + पद् + क्त = प्रत्युत्पन्न
- द्वावेतौ — द्वौ + एतौ = द्वावेतौ (औ + ए = आवे, वृद्धि सन्धि)
- सुखमेधेते — सुखम् + एधेते (म् + ए)
- एधेते — एध् धातु (= बढ़ना, फलना-फूलना), लट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन (आत्मनेपद)। द्विवचन का प्रयोग “दो” के लिए विशेष है
- यद्भविष्यः — यत् + भविष्य = यद्भविष्य (त् + भ = द्भ), बहुव्रीहि (= जिसका भविष्य “जो होगा” है = भाग्यवादी)
- विनश्यति — वि + नश् धातु, लट् लकार, एकवचन