पञ्चतन्त्र मध्यम
काक-उलूक कथा — बुद्धि युद्ध
मूल पाठ
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।
वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥
वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥
यह पञ्चतन्त्र के तृतीय तन्त्र काकोलूकीय (कौवे और उल्लू की कथा) से लिया गया अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है। यह बुद्धि की सर्वोच्चता का सन्देश देता है — शारीरिक बल से अधिक महत्त्वपूर्ण बुद्धि-बल है।
कथा-सार: एक वन में एक अत्यन्त क्रूर सिंह सब पशुओं को मारता था। एक छोटे खरगोश ने बुद्धि से काम लिया — उसने सिंह को बताया कि वन में दूसरा सिंह आ गया है। क्रोधित सिंह को कुएँ में अपनी ही परछाईं दिखाई, जिसे दूसरा सिंह समझकर वह कुएँ में कूद पड़ा और मर गया। इस प्रकार बुद्धि ने बल पर विजय पाई।
व्याकरण विशेष
- बुद्धिर्यस्य — बुद्धिः + यस्य = बुद्धिर्यस्य (विसर्ग → र् + य)
- निर्बुद्धेः — निः + बुद्धि = निर्बुद्धि (विसर्ग → र् + ब; नञ् तत्पुरुष), षष्ठी एकवचन
- कुतः — प्रश्नवाचक अव्यय (= कहाँ से)। यहाँ आलंकारिक प्रश्न है — अर्थात् “बल है ही नहीं”
- मदोन्मत्तः — मद + उन्मत्त = मदोन्मत्तः (गुण सन्धि: अ + उ = ओ)। बहुव्रीहि समास (= मद से उन्मत्त हुआ)
- शशकेन — शशक शब्द (= खरगोश), तृतीया एकवचन (= खरगोश द्वारा — कर्मवाच्य में कर्ता)
- निपातितः — नि + पत् धातु + णिच् + क्त = निपातित (= गिराया गया, मारा गया)। प्रेरणार्थक + कर्मवाच्य
- यह श्लोक यस्य-तस्य (जिसका-उसका) सहसम्बन्ध संरचना का उत्तम उदाहरण है