पञ्चतन्त्र सरल
हाथी-चूहा — छोटों की सहायता
मूल पाठ
नातिदूरं न चात्यन्तमनुगच्छेत्कदाचन।
न तिष्ठेन्न च गच्छेद्वा महतां सन्निधौ क्वचित्॥
न तिष्ठेन्न च गच्छेद्वा महतां सन्निधौ क्वचित्॥
यह पञ्चतन्त्र की प्रसिद्ध हाथी-चूहा कथा से सम्बन्धित श्लोक है। यह बड़ों के साथ व्यवहार की नीति सिखाता है — न बहुत दूर रहो, न बहुत निकट। मध्यम मार्ग अपनाओ।
कथा-सार: एक वन में चूहों का बड़ा समूह रहता था। हाथियों का झुण्ड जब तालाब पर जाता, तो चूहों के बिल कुचल जाते थे। चूहों के राजा ने हाथियों के राजा से प्रार्थना की कि वे दूसरे मार्ग से जाएँ, और बदले में कभी सहायता का वचन दिया। बाद में जब शिकारियों ने हाथियों को जाल में फँसाया, तो चूहों ने रस्सियाँ कुतरकर उन्हें मुक्त किया। शिक्षा — छोटों को कभी तुच्छ न समझो, उनकी सहायता भी बड़ी हो सकती है।
व्याकरण विशेष
- नातिदूरम् — न + अतिदूरम् = नातिदूरम् (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ)
- चात्यन्तम् — च + अत्यन्तम् = चात्यन्तम् (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ)
- अनुगच्छेत् — अनु + गम् धातु, विधिलिङ्ग, प्रथम पुरुष एकवचन (= अनुसरण करे)
- तिष्ठेत् — स्था धातु (1ला गण), विधिलिङ्ग (= ठहरे)। स्था → तिष्ठ (लट्/विधिलिङ्ग में)
- गच्छेद्वा — गच्छेत् + वा = गच्छेद्वा (त् + व = द्व, व्यञ्जन सन्धि)
- महताम् — महत् शब्द, षष्ठी बहुवचन (= बड़ों का, महान् लोगों का)
- सन्निधौ — सम् + निधि = सन्निधि (= समीपता), सप्तमी एकवचन (= समीप, पास में)
- क्वचित् — अव्यय (= कहीं भी)। सामान्यतः “न क्वचित्” = कहीं भी नहीं