पञ्चतन्त्र मध्यम
ब्राह्मण-बकरा — धूर्तों से सावधान
मूल पाठ
संघो हि शक्तस्तुर्येन सर्वकार्याणि साधयेत्।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥
यह पञ्चतन्त्र का प्रसिद्ध श्लोक संगठन की शक्ति का वर्णन करता है। ब्राह्मण और बकरे की कथा में तीन धूर्त मिलकर एक ब्राह्मण को भ्रमित कर देते हैं — यह बताता है कि संगठित होकर छोटे भी बड़ा कार्य कर सकते हैं।
कथा-सार: एक ब्राह्मण यज्ञ के लिए बकरा ले जा रहा था। तीन ठगों ने मिलकर योजना बनाई। पहले ने कहा — “यह कुत्ता क्यों ले जा रहे हो?” दूसरे ने कहा — “यह तो गधा है!” तीसरे ने कहा — “यह सूअर है!” ब्राह्मण भ्रमित होकर बकरे को छोड़कर भाग गया। शिक्षा — संगठित धूर्तों से सावधान रहें, और अपनी बुद्धि पर विश्वास रखें।
व्याकरण विशेष
- शक्तस्तुर्येन — शक्तः + तुर्येन = शक्तस्तुर्येन (विसर्ग + त = स्त)
- साधयेत् — साध् धातु + णिच् (प्रेरणार्थक), विधिलिङ्ग, प्रथम पुरुष एकवचन (= सिद्ध करे)
- तृणैः — तृण शब्द (नपुंसकलिङ्ग, = तिनका), तृतीया बहुवचन
- गुणत्वम् — गुण + त्व प्रत्यय = गुणत्व (= रस्सी का भाव/स्वरूप)। यहाँ “गुण” = रस्सी
- आपन्नैः — आ + पद् धातु + क्त = आपन्न (= प्राप्त, बदला हुआ), तृतीया बहुवचन
- तृणैर्गुणत्वमापन्नैः — तृणैः + गुणत्वम् + आपन्नैः (विसर्ग → र्)
- बध्यन्ते — बन्ध् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन (= बाँधे जाते हैं)
- मत्तदन्तिनः — मत्त + दन्तिन् (= मदमस्त हाथी), प्रथमा बहुवचन। दन्तिन् = दाँतों वाला = हाथी