हितोपदेश मध्यम
विग्रह पर्व — संघर्ष
मूल पाठ
विनाशकाले विपरीतबुद्धिर्भवति देहिनाम्।
नियतिः कुर्वती राजन् देशकालोपदेशिनी॥
नियतिः कुर्वती राजन् देशकालोपदेशिनी॥
यह हितोपदेश के विग्रह (संघर्ष) खण्ड से लिया गया प्रसिद्ध श्लोक है। इसका सन्देश अत्यन्त गम्भीर है — जब किसी का विनाश निकट होता है, तो उसकी बुद्धि स्वयं उलटी हो जाती है। यही नियति (भाग्य) का विधान है।
यह श्लोक राजनीति और युद्ध-नीति के सन्दर्भ में कहा गया है। विग्रह पर्व में बताया गया है कि संघर्ष कब और क्यों होता है, और कैसे विपरीत बुद्धि के कारण प्राणी अपने विनाश को स्वयं आमन्त्रित करते हैं।
व्याकरण विशेष
- विनाशकाले — विनाश + काल, षष्ठी तत्पुरुष समास (= विनाश का काल), सप्तमी एकवचन
- विपरीतबुद्धिः — विपरीत + बुद्धि, कर्मधारय समास (= विपरीत बुद्धि), प्रथमा एकवचन
- विपरीतबुद्धिर्भवति — विपरीतबुद्धिः + भवति = विपरीतबुद्धिर्भवति (विसर्ग → र् + भ)
- देहिनाम् — देहिन् शब्द (= देहधारी, प्राणी), षष्ठी बहुवचन
- नियतिः — नि + यम् धातु + क्तिन् प्रत्यय = नियति (= भाग्य, विधि)
- कुर्वती — कृ धातु + शतृ प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग (= करती हुई)। वर्तमान कृदन्त
- देशकालोपदेशिनी — देश + काल + उपदेशिनी, बहुपदी समास। काल + उपदेशिनी = कालोपदेशिनी (गुण सन्धि: अ + उ = ओ)। उपदेशिनी = उपदेश करने वाली (इनि प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग)