हितोपदेश मध्यम
सिंह-मूषक कथा — कृतज्ञता की कथा
मूल पाठ
उपकारं विस्मरति यः करोत्यपकारं च सः।
तस्य दग्धस्य नश्यन्ति सर्वे लोकाः सनातनाः॥
कृतं प्रतिकृतं यस्य परार्थे स्वार्थमुत्सृजेत्।
अल्पस्यापि हि धर्मस्य महतीं रक्षते भयात्॥
तस्य दग्धस्य नश्यन्ति सर्वे लोकाः सनातनाः॥
कृतं प्रतिकृतं यस्य परार्थे स्वार्थमुत्सृजेत्।
अल्पस्यापि हि धर्मस्य महतीं रक्षते भयात्॥
यह कथा हितोपदेश के मित्रलाभ भाग से ली गई है। इसमें एक सिंह और एक छोटे मूषक (चूहे) की कथा है जो कृतज्ञता (gratitude) की शिक्षा देती है।
कथा का सार इस प्रकार है — एक वन में एक बलवान सिंह सो रहा था। एक छोटा मूषक उसके शरीर पर चढ़ गया, जिससे सिंह जाग गया। क्रोधित सिंह ने मूषक को पकड़ लिया। मूषक ने प्रार्थना की — “हे राजन्! मुझे छोड़ दीजिए, मैं किसी दिन आपके काम आऊँगा।” सिंह ने हँसकर उसे छोड़ दिया। कुछ समय बाद वही सिंह शिकारी के जाल में फँस गया। मूषक ने अपने तीक्ष्ण दाँतों से जाल काट दिया और सिंह को मुक्त किया।
प्रस्तुत श्लोक इस कथा से सम्बद्ध नीतिवचन हैं — उपकार को न भूलें और छोटे से भी सहायता बड़े संकट में काम आती है।
व्याकरण विशेष
- विस्मरति — वि + स्मृ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= भूल जाता है)
- दग्धस्य — दह् धातु का क्त प्रत्ययान्त रूप “दग्ध”, षष्ठी विभक्ति एकवचन
- नश्यन्ति — नश् (चतुर्थ गण) धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन
- उत्सृजेत् — उत् + सृज् धातु, विधिलिङ्ग लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= त्याग दे)
- परार्थे — पर + अर्थ, षष्ठी तत्पुरुष समास, सप्तमी विभक्ति एकवचन (= दूसरे के हित में)
- स्वार्थम् — स्व + अर्थ, षष्ठी तत्पुरुष समास, द्वितीया विभक्ति एकवचन
- अल्पस्य — अल्प शब्द, षष्ठी विभक्ति एकवचन (= छोटे का)