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हितोपदेश मध्यम

नीली गीदड़ — छद्म का अन्त

मूल पाठ

मूर्खं चात्मानमायाति प्रभुत्वे यो नियोजयेत्।
तस्य स्वयं विपद्भावो नीलशृगालवद्भवेत्॥

यह हितोपदेश की अत्यन्त प्रसिद्ध कथा नीलशृगाल (नीला सियार) से सम्बन्धित श्लोक है। यह कथा छद्म (धोखे) और अयोग्य नेतृत्व के दुष्परिणामों का वर्णन करती है।

कथा-सार: एक सियार भागते हुए एक रंगरेज़ के घर में गिर गया और नीले रंग में रंग गया। वन में लौटने पर सभी पशु उसे नहीं पहचान सके। उसने स्वयं को दिव्य प्राणी बताकर सबका राजा बन गया। परन्तु एक रात जब अन्य सियारों ने आवाज़ लगाई, तो उसने भी अपनी स्वाभाविक आवाज़ में हुआँ-हुआँ कर दिया। उसकी असलियत सामने आ गई और सब पशुओं ने उसे मार डाला। शिक्षा — छद्म (प्रपञ्च) सदा के लिए नहीं टिकता।

व्याकरण विशेष

  • चात्मानम् — च + आत्मानम् = चात्मानम् (दीर्घ सन्धि: अ + आ = आ)
  • आत्मानमायाति — आत्मानम् + आयाति = आत्मानमायाति (म् + आ)
  • प्रभुत्वे — प्रभु + त्व (भाववाचक प्रत्यय) = प्रभुत्व, सप्तमी एकवचन (= प्रभुत्व में)
  • नियोजयेत् — नि + युज् धातु + णिच् (प्रेरणार्थक), विधिलिङ्ग, प्रथम पुरुष एकवचन (= नियुक्त करे)
  • विपद्भावः — विपद् + भाव, षष्ठी तत्पुरुष समास (= विपत्ति का भाव)। द् + भ = द्भ
  • नीलशृगालवत् — नील + शृगाल + वत् (वतुप् प्रत्यय, = की तरह)। कर्मधारय + अव्यय प्रत्यय
  • भवेत् — भू धातु, विधिलिङ्ग, प्रथम पुरुष एकवचन (= होता है / हो)