हितोपदेश मध्यम
मृग कथा — लोभ विनाश
मूल पाठ
लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च।
लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति॥
लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति॥
यह हितोपदेश का श्लोक लोभ के दुष्परिणामों का वर्णन करता है। मृग (हिरण) की कथा में एक हिरण अपने लोभ के कारण जाल में फँसकर प्राण गँवाता है।
कथा-सार: एक हिरण सुन्दर हरी घास के लोभ में आकर बार-बार एक ऐसे स्थान पर जाता था जहाँ शिकारी जाल बिछाए रहता था। उसके मित्रों ने बहुत चेतावनी दी, किन्तु लोभ ने उसकी बुद्धि नष्ट कर दी। अन्ततः वह जाल में फँसकर प्राणों से हाथ धो बैठा। शिक्षा — लोभ सब पापों और विपत्तियों का मूल है।
व्याकरण विशेष
- लोभमूलानि — लोभ + मूल, बहुव्रीहि समास (= जिनका मूल लोभ है), नपुंसकलिङ्ग प्रथमा बहुवचन
- पापानि — पाप शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा बहुवचन
- संकटानि — संकट शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा बहुवचन
- तथैव — तथा + एव = तथैव (वृद्धि सन्धि: आ + ए = ऐ)
- लोभात् — लोभ शब्द, पञ्चमी एकवचन (= लोभ से, अपादान/कारण)
- प्रवर्तते — प्र + वृत् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (आत्मनेपद) (= उत्पन्न होता है)
- वैरम् — वैर शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा एकवचन (= शत्रुता)
- अतिलोभात् — अति + लोभ, अव्ययीभाव समास, पञ्चमी एकवचन (= अत्यधिक लोभ से)
- विनश्यति — वि + नश् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= नष्ट होता है)