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हितोपदेश मध्यम

मित्रलाभ — हितोपदेशः प्रथम भाग

मूल पाठ

मित्रलाभो मित्रभेदश्च विग्रहः सन्धिरेव च।
पूर्णबुद्धिप्रबोधार्थं पञ्चतन्त्रात् तथान्यतः॥
अधीत्येदं नरो यः कश्चिन्नीतिशास्त्रं पठेद्बुधः।
श्रूयतां तत्प्रवक्ष्यामि कथामुख्यं मनोहरम्॥

हितोपदेश संस्कृत साहित्य का एक अत्यन्त प्रसिद्ध नीतिग्रन्थ है। इसकी रचना नारायण पण्डित ने की थी। यह ग्रन्थ मूलतः पञ्चतन्त्र पर आधारित है, किन्तु नारायण पण्डित ने अन्य स्रोतों से भी कथाएँ और श्लोक संकलित किए हैं। “हितोपदेश” का अर्थ है — हित का उपदेश अर्थात् भलाई की शिक्षा।

हितोपदेश के चार भाग हैं:

  1. मित्रलाभ — सच्चे मित्रों की प्राप्ति कैसे हो
  2. मित्रभेद (सुहृद्भेद) — मित्रों में फूट कैसे पड़ती है
  3. विग्रह — युद्ध और संघर्ष
  4. सन्धि — मेल और समझौता

इस ग्रन्थ का उद्देश्य पशु-पक्षियों की रोचक कथाओं के माध्यम से नीति और व्यवहार की शिक्षा देना है। प्रस्तुत श्लोक ग्रन्थ के प्रारम्भ से लिया गया है, जिसमें इन चारों भागों का उल्लेख है।

व्याकरण विशेष

  • मित्रलाभः — मित्र + लाभ, षष्ठी तत्पुरुष समास (मित्र का लाभ), प्रथमा विभक्ति एकवचन
  • पूर्णबुद्धिप्रबोधार्थम् — पूर्ण + बुद्धि + प्रबोध + अर्थम्, बहुपदी समास। अर्थम् = के लिए (चतुर्थी अर्थ)
  • पञ्चतन्त्रात् — पञ्चतन्त्र शब्द, पञ्चमी विभक्ति एकवचन (= से, अपादान कारक)
  • अधीत्य — अधि + इ धातु, ल्यबन्त (= पढ़कर), पूर्वकालिक क्रिया
  • पठेत् — पठ् धातु, विधिलिङ्ग लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= पढ़े)
  • श्रूयताम् — श्रु धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार (= सुना जाए)
  • प्रवक्ष्यामि — प्र + वच् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन (= मैं कहूँगा)