हितोपदेश मध्यम
काक-सर्प कथा — बुद्धि की विजय
मूल पाठ
उपायेन हि यच्छक्यं न तद्बलेन साध्यते।
गोमायुना हतः सिंहो मुद्गरेण न लोहसम्॥
गोमायुना हतः सिंहो मुद्गरेण न लोहसम्॥
यह हितोपदेश का प्रसिद्ध श्लोक है जो बुद्धि की श्रेष्ठता का सन्देश देता है। काक-सर्प कथा में एक कौआ अपने बच्चों की रक्षा के लिए सर्प को बुद्धि-युक्ति से परास्त करता है, न कि बल से।
कथा-सार: एक वृक्ष पर कौआ और उसका परिवार रहता था। एक सर्प बार-बार उसके अण्डे और बच्चे खा जाता था। कौए ने एक सियार मित्र की सलाह से उपाय किया — रानी का हार चुराकर सर्प के बिल में डाल दिया। राजा के सैनिकों ने हार खोजते समय सर्प को मार दिया। इस प्रकार बुद्धि ने बल पर विजय पाई।
व्याकरण विशेष
- उपायेन — उपाय शब्द, तृतीया एकवचन (= उपाय से, करण कारक)
- यच्छक्यम् — यत् + शक्यम् = यच्छक्यम् (त् + श = च्छ, व्यञ्जन सन्धि)
- शक्यम् — शक् धातु + यत् प्रत्यय (= किया जा सकने वाला)
- तद्बलेन — तत् + बलेन = तद्बलेन (त् + ब = द्ब, व्यञ्जन सन्धि)
- साध्यते — साध् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार (= सिद्ध किया जाता है)
- गोमायुना — गोमायु शब्द (= सियार, गीदड़), तृतीया एकवचन (= सियार द्वारा, कर्ता कारक — कर्मवाच्य में)
- हतः — हन् धातु + क्त प्रत्यय = हत (= मारा गया)
- मुद्गरेण — मुद्गर शब्द (= गदा), तृतीया एकवचन
- लोहसम् — लोह + सम (= लोहे के समान)। यहाँ अर्थ है लोहे की गदा