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हितोपदेश मध्यम

हंस-कच्छप कथा — मौन का महत्त्व

मूल पाठ

अतिवादो हि बुद्धीनां निशम्य सदसि द्विजाः।
नश्यन्ति बुद्धयो बालानां ग्रीष्मे कूपजलं यथा॥

यह हितोपदेश से लिया गया श्लोक है जो मितभाषिता (कम बोलने) का महत्त्व बताता है। हंस-कच्छप कथा में एक कछुआ अत्यधिक बोलने के कारण अपनी जान गँवा बैठता है।

कथा-सार: एक तालाब में एक कछुआ और दो हंस मित्र थे। जब तालाब सूखने लगा, तो हंसों ने कछुए को एक डण्डे के सहारे उड़ाकर दूसरे तालाब में ले जाने का उपाय सोचा। कछुए को डण्डे को मुँह से पकड़कर चुप रहना था। परन्तु रास्ते में गाँव के लोगों की बातें सुनकर कछुए ने बोलने के लिए मुँह खोल दिया और नीचे गिरकर मर गया। शिक्षा — अत्यधिक बोलना विनाश का कारण बनता है।

व्याकरण विशेष

  • अतिवादः — अति + वाद (वद् धातु + घञ् प्रत्यय) = अत्यधिक बोलना। अव्ययीभाव समास
  • बुद्धीनाम् — बुद्धिन् शब्द (= बुद्धिमान्), षष्ठी बहुवचन
  • निशम्य — नि + शम् धातु, ल्यबन्त (= सुनकर)। पूर्वकालिक क्रिया
  • सदसि — सदस् शब्द (नपुंसकलिङ्ग, = सभा), सप्तमी एकवचन
  • नश्यन्ति — नश् धातु (4था गण, दिवादिगण), लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन (= नष्ट होती हैं)
  • बुद्धयः — बुद्धि शब्द (स्त्रीलिङ्ग), प्रथमा बहुवचन (= बुद्धियाँ)
  • बालानाम् — बाल शब्द (= अज्ञानी, मूर्ख), षष्ठी बहुवचन
  • कूपजलम् — कूप + जल, षष्ठी तत्पुरुष (= कुएँ का जल)
  • ग्रीष्मे — ग्रीष्म शब्द, सप्तमी एकवचन (= ग्रीष्म ऋतु में)