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भगवद्गीता मध्यम

योगस्थः कुरु कर्माणि — समत्व योग (2.48)

मूल पाठ

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

यह भगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 48 है — प्रसिद्ध श्लोक 2.47 (कर्मण्येवाधिकारस्ते) के ठीक बाद। यहाँ श्रीकृष्ण योग की परिभाषा देते हैं — समत्वं योग उच्यते (समभाव ही योग है)। यह गीता की सबसे सरल और गहन परिभाषाओं में से एक है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म करते समय दो बातें आवश्यक हैं:

  1. सङ्गत्याग — फल की आसक्ति छोड़ो
  2. समत्वभाव — सफलता-असफलता में समान रहो

व्याकरण विशेष

  • योगस्थः — योग + स्थ (स्था धातु + क), प्रथमा एकवचन। सप्तमी तत्पुरुष (= योग में स्थित)
  • कुरु — कृ धातु (8वाँ गण, तनादिगण), लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन (= करो)
  • त्यक्त्वा — त्यज् धातु + क्त्वा प्रत्यय (= त्यागकर)। ज् → क् आदेश
  • सिद्ध्यसिद्ध्योः — सिद्धि + असिद्धि, द्वन्द्व समास, सप्तमी द्विवचन (= सफलता और असफलता में)। सिद्धि + असिद्ध्योः = सिद्ध्यसिद्ध्योः (यण् सन्धि: इ + अ = य)
  • भूत्वा — भू धातु + क्त्वा प्रत्यय (= होकर)
  • समत्वम् — सम + त्व (भाववाचक प्रत्यय) = समत्व (= समान होने का भाव)
  • उच्यते — वच् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन (= कहा जाता है)। वच् → उच् (सम्प्रसारण)