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भगवद्गीता मध्यम

उद्धरेदात्मनात्मानम् — आत्मोद्धार (6.5)

मूल पाठ

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

यह भगवद्गीता के अध्याय 6 (आत्मसंयमयोग / ध्यानयोग), श्लोक 5 है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण आत्मनिर्भरता का सन्देश देते हैं — मनुष्य स्वयं ही अपना उद्धारक है और स्वयं ही अपना विनाशक। यह श्लोक व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का प्रबल सन्देश है।

इस श्लोक में “आत्मन्” शब्द का बार-बार प्रयोग ध्यान देने योग्य है — छह बार! प्रत्येक बार भिन्न विभक्ति में, जिससे अनेक अर्थ-छटाएँ प्रकट होती हैं।

व्याकरण विशेष

  • उद्धरेदात्मनात्मानम् — तीन पदों की सन्धि:
    • उद्धरेत् + आत्मना = उद्धरेदात्मना (त् + आ = दा, व्यञ्जन सन्धि)
    • आत्मना + आत्मानम् = आत्मनात्मानम् (दीर्घ सन्धि: आ + आ = आ)
  • उद्धरेत् — उत् + हृ धातु, विधिलिङ्ग, प्रथम पुरुष एकवचन (= उद्धार करे)
  • नात्मानम् — न + आत्मानम् = नात्मानम् (दीर्घ सन्धि: अ + आ = आ)
  • अवसादयेत् — अव + सद् धातु + णिच् (प्रेरणार्थक), विधिलिङ्ग (= गिराए, अधोगति दे)
  • आत्मैव — आत्मा + एव = आत्मैव (वृद्धि सन्धि: आ + ए = ऐ)
  • ह्यात्मनो — हि + आत्मनः = ह्यात्मनो (यण् सन्धि: इ + आ = या; विसर्ग → ओ)
  • बन्धुरात्मैव — बन्धुः + आत्मा + एव = बन्धुरात्मैव (विसर्ग → र् + आ; आ + ए = ऐ)
  • रिपुरात्मनः — रिपुः + आत्मनः = रिपुरात्मनः (विसर्ग → र् + आ)

आत्मन् शब्द — विभक्ति अभ्यास

रूपविभक्तिअर्थ
आत्मानम्द्वितीया एकवचनअपने आपको
आत्मनातृतीया एकवचनअपने द्वारा
आत्मनःषष्ठी एकवचनअपना
आत्माप्रथमा एकवचनस्वयं