भगवद्गीता मध्यम
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि — आत्मा अवध्य (2.23)
मूल पाठ
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
यह भगवद्गीता के अध्याय 2 (सांख्ययोग), श्लोक 23 है। पूर्व श्लोक (2.22) में वस्त्र की उपमा से आत्मा की अमरता बताने के बाद, इस श्लोक में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि आत्मा को पञ्चभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में से कोई भी नष्ट नहीं कर सकता। यह श्लोक आत्मा की अविनाशिता का प्रबल प्रमाण देता है।
इस श्लोक में चार निषेध वाक्य हैं — शस्त्र, अग्नि, जल और वायु — ये चार तत्त्व आत्मा को क्षति नहीं पहुँचा सकते।
व्याकरण विशेष
- नैनम् — न + एनम् = नैनम् (वृद्धि सन्धि: अ + ए = ऐ)
- छिन्दन्ति — छिद् धातु (7वाँ गण, रुधादिगण), लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन। छिद् + न + अन्ति = छिन्दन्ति (नासिक्य आगम)
- शस्त्राणि — शस्त्र शब्द (नपुंसकलिङ्ग), प्रथमा बहुवचन (= शस्त्र)
- दहति — दह् धातु (1ला गण), लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन
- पावकः — पू धातु + ण्वुल् प्रत्यय = पावक (पवित्र करने वाला = अग्नि)
- क्लेदयन्ति — क्लिद् धातु + णिच् (प्रेरणार्थक) = क्लेदय, लट् बहुवचन (= गीला करते हैं)
- चैनम् — च + एनम् = चैनम् (वृद्धि सन्धि: अ + ए = ऐ)
- आपः — अप् शब्द (स्त्रीलिङ्ग), प्रथमा बहुवचन। यह शब्द सदा बहुवचन में प्रयुक्त होता है (= जल)
- शोषयति — शुष् धातु + णिच् = शोषय (सुखाना), लट् एकवचन
- मारुतः — मरुत् शब्द, प्रथमा एकवचन (= वायु)