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भगवद्गीता सरल

मन्मना भव मद्भक्तो — सरल भक्ति (18.65)

मूल पाठ

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥

यह भगवद्गीता के अध्याय 18, श्लोक 65 है — अन्तिम अध्याय के समापन भाग से। यह श्लोक अत्यन्त सरल और स्नेहपूर्ण है। श्रीकृष्ण सीधे, सरल शब्दों में भक्ति के चार मार्ग बताते हैं और अर्जुन को व्यक्तिगत प्रतिज्ञा देते हैं।

इस श्लोक में चार निर्देश हैं:

  1. मन्मना भव — मन मुझमें लगाओ
  2. मद्भक्तः — मेरे भक्त बनो
  3. मद्याजी — मेरा यजन (पूजा) करो
  4. मां नमस्कुरु — मुझे नमस्कार करो

सबसे विशेष बात यह है कि श्रीकृष्ण कहते हैं — प्रियोऽसि मे (तुम मुझे प्रिय हो) — यह ईश्वर के व्यक्तिगत स्नेह का प्रमाण है।

व्याकरण विशेष

  • मन्मनाः — मत् + मनस् = मन्मनस्, बहुव्रीहि समास (= जिसका मन मुझमें है)। मत् + म = न्म (त् → न् अनुनासिक सन्धि)
  • मद्भक्तः — मत् + भक्त = मद्भक्तः (त् + भ = द्भ, व्यञ्जन सन्धि)
  • मद्याजी — मत् + याजिन् = मद्याजी (त् + य = द्य)। याजिन् = यजन करने वाला
  • नमस्कुरु — नमस् + कुरु, यहाँ नमस् अव्यय कृ धातु के साथ मिलकर “नमस्कार करना” अर्थ देता है
  • मामेवैष्यसि — माम् + एव + एष्यसि:
    • एव + एष्यसि = एवैष्यसि (वृद्धि सन्धि: अ + ए = ऐ)
  • एष्यसि — इ धातु (= जाना, प्राप्त करना), लृट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन (= प्राप्त करोगे)
  • प्रतिजाने — प्रति + ज्ञा धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन (आत्मनेपद) (= प्रतिज्ञा करता हूँ)
  • प्रियोऽसि — प्रियः + असि = प्रियोऽसि (विसर्ग सन्धि: ः + अ = ो + ऽ)