मुख्य सामग्री पर जाएँ
भगवद्गीता मध्यम

कर्मण्येवाधिकारस्ते — कर्तव्य पालन (2.47)

मूल पाठ

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

यह श्रीमद्भगवद्गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है। अध्याय 2 (सांख्ययोग), श्लोक 47 में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का सार बताते हैं। इस एक श्लोक में गीता के कर्मयोग का सम्पूर्ण सिद्धान्त समाहित है — कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो, किन्तु कर्म छोड़ो भी मत।

इस श्लोक के चार निर्देश हैं:

  1. कर्म में तुम्हारा अधिकार है
  2. फल में कभी अधिकार नहीं
  3. कर्मफल की इच्छा से कर्म मत करो
  4. कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो

व्याकरण विशेष

  • कर्मण्येवाधिकारस्ते — यह तीन सन्धियों का संयोग है:
    • कर्मणि + एव = कर्मण्येव (यण् सन्धि: इ + ए = ये)
    • एव + अधिकारः = एवाधिकारः (दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ)
    • अधिकारः + ते = अधिकारस्ते (विसर्ग सन्धि: ः + त = स्त)
  • कर्मफलहेतुर्भूः — कर्म-फल-हेतुः + भूः = कर्मफलहेतुर्भूः (विसर्ग → र् + भ)
  • सङ्गोऽस्त्वकर्मणि — सङ्गः + अस्तु + अकर्मणि:
    • सङ्गः + अस्तु = सङ्गोऽस्तु (विसर्ग सन्धि: ः + अ = ो + ऽ)
    • अस्तु + अकर्मणि = अस्त्वकर्मणि (यण् सन्धि: उ + अ = व)
  • फलेषु — फल शब्द, सप्तमी विभक्ति बहुवचन
  • अकर्मणि — न + कर्मन् = अकर्मन् (नञ् तत्पुरुष समास), सप्तमी एकवचन