भगवद्गीता कठिन
दिवि सूर्यसहस्रस्य — विश्वरूप (11.12)
मूल पाठ
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
यह भगवद्गीता के अध्याय 11 (विश्वरूपदर्शनयोग), श्लोक 12 है। यह सम्पूर्ण गीता के सर्वाधिक भव्य और काव्यात्मक श्लोकों में से एक है। जब श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाते हैं, तब संजय इस दृश्य का वर्णन करता है — उस दिव्य रूप का प्रकाश ऐसा था मानो हजार सूर्य एक साथ उग आए हों।
यह श्लोक उपमा अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस श्लोक ने विश्व साहित्य को प्रभावित किया है — अमेरिकी भौतिकशास्त्री जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने प्रथम परमाणु परीक्षण के समय इसी श्लोक को उद्धृत किया था।
व्याकरण विशेष
- सूर्यसहस्रस्य — सूर्य + सहस्र, षष्ठी तत्पुरुष समास (= सूर्यों के सहस्र का), फिर षष्ठी एकवचन
- भवेद्युगपत् — भवेत् + युगपत् = भवेद्युगपत् (त् + य = द्य, व्यञ्जन सन्धि)
- युगपत् — अव्यय (= एक साथ, simultaneously)
- उत्थिता — उत् + स्था धातु + क्त प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग (= उदित हुई)। स्था → स्थित → (उत्) थित
- भाः — भा शब्द (स्त्रीलिङ्ग, = प्रकाश), प्रथमा एकवचन
- सदृशी — सदृश शब्द, स्त्रीलिङ्ग (ङीष् प्रत्यय) (= समान)
- स्याद्भासः — स्यात् + भासः = स्याद्भासः (त् + भ = द्भ, व्यञ्जन सन्धि)
- भासः — भास् शब्द (= प्रकाश, दीप्ति), षष्ठी एकवचन
- महात्मनः — महत् + आत्मन् = महात्मन्, बहुव्रीहि समास (= महान् आत्मा वाला), षष्ठी एकवचन
- दिवि — दिव् शब्द (= आकाश, स्वर्ग), सप्तमी एकवचन