मुख्य सामग्री पर जाएँ
भगवद्गीता मध्यम

अनन्याश्चिन्तयन्तो माम् — भक्ति (9.22)

मूल पाठ

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

यह भगवद्गीता के अध्याय 9 (राजविद्याराजगुह्ययोग), श्लोक 22 है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण अनन्य भक्तों के प्रति अपने विशेष आश्वासन की घोषणा करते हैं — जो केवल मेरा ही चिन्तन करते हैं, उनकी सम्पूर्ण चिन्ता मैं स्वयं करता हूँ।

योगक्षेम एक महत्त्वपूर्ण संस्कृत शब्द है:

  • योग = जो प्राप्त नहीं है उसकी प्राप्ति (acquisition of what is not possessed)
  • क्षेम = जो प्राप्त है उसकी रक्षा (preservation of what is possessed)

व्याकरण विशेष

  • अनन्याः — अन् + अन्य = अनन्य (नञ् तत्पुरुष समास), प्रथमा बहुवचन (= अनन्य भाव वाले)
  • अनन्याश्चिन्तयन्तः — अनन्याः + चिन्तयन्तः = अनन्याश्चिन्तयन्तः (विसर्ग + च = श् + च)
  • चिन्तयन्तः — चिन्त् धातु + शतृ प्रत्यय (= चिन्तन करते हुए), प्रथमा बहुवचन। शतृ प्रत्यय वर्तमान कालिक कृदन्त बनाता है
  • पर्युपासते — परि + उप + आस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन (आत्मनेपद)। परि + उप = पर्युप (यण् सन्धि)
  • नित्याभियुक्तानाम् — नित्य + अभियुक्त, कर्मधारय समास, षष्ठी बहुवचन (= सदा समर्पित लोगों का)
  • योगक्षेमम् — योग + क्षेम, द्वन्द्व समास (= अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा)
  • वहामि — वह् धातु (1ला गण), लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन (= वहन करता हूँ)
  • वहाम्यहम् — वहामि + अहम् = वहाम्यहम् (यण् सन्धि: इ + अ = य)